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Gulzar Poetry ( गुलज़ार कविता )

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1.Gulzar Poetry ( गुलज़ार कविता )



1. आमीन

ख्याल, सांस नज़र, सोच खोलकर दे दो
लबों से बोल उतारो, जुबां से आवाज़ें
हथेलियों से लकीरें उतारकर दे दो
हाँ, दे दो अपनी 'खुदी' भी की 'खुद' नहीं हो तुम
उतारों रूह से ये जिस्म का हसीं गहना
उठो दुआ से तो 'आमीन' कहके रूह दे दो

2. मरियम

रात में देखो झील का चेहरा
किस कदर पाक, पुर्सुकुं, गमगीं
कोई साया नहीं है पानी पर
कोई सिलवट नहीं है आँखों में
नीन्द आ जाये दर्द को जैसे
जैसे मरियम उडाद बैठी हो

जैसे चेहरा हटाके चेहरे का
सिर्फ एहसास रख दिया हो वहाँ

3. आह!

ठंडी साँसे ना पालो सीने में
लम्बी सांसों में सांप रहते हैं
ऐसे ही एक सांस ने इक बार
डस लिया था हसी क्लियोपेत्रा को

मेरे होटों पे अपने लब रखकर
फूँक दो सारी साँसों को 'बीबा'

मुझको आदत है ज़हर पीने की

4. मानी

चौक से चलकर, मंडी से, बाज़ार से होकर
लाल गली से गुज़री है कागज़ की कश्ती
बारिश के लावारिस पानी पर बैठी बेचारी कश्ती
शहर की आवारा गलियों से सहमी-सहमी पूछ रही हैं
हर कश्ती का साहिल होता है तो-
मेरा भी क्या साहिल होगा?

एक मासूम-से बच्चे ने
बेमानी को मानी देकर
रद्दी के कागज़ पर कैसा ज़ुल्म किया है

5. मुन्द्रे

नीले-नीले से शब के गुम्बद में
तानपुरा मिला रहा है कोई

एक शफ्फाफ़ काँच का दरिया
जब खनक जाता है किनारों से
देर तक गूँजता है कानो में

पलकें झपका के देखती हैं शमएं
और फ़ानूस गुनगुनाते हैं
मैंने मुन्द्रों की तरह कानो में
तेरी आवाज़ पहन रक्खी है

6. त्रिवेणी-1

आओ, सारे पहन लें आईने
सारे देखेंगे अपना ही चेहरा

रूह? अपनी भी किसने देखी है!

क्या पता कब, कहाँ से मारेगी
बस कि मैं ज़िन्दगी से डरता हूँ

मौत का क्या है, एक बार मारेगी

उठते हुए जाते हुए पंछी ने बस इतना ही देखा
देर तक हाथ हिलाती रही वो शाख़ फ़िज़ा में

अलविदा कहने को, या पास बुलाने के लिए?

त्रिवेणी-2

सब पे आती है सब की बारी से
मौत मुंसिफ़ है कम-ओ-बेश नहीं

ज़िन्दगी सब पे क्यूँ नहीं आती

कौन खायेगा किसका हिस्सा है
दाने-दाने पे नाम लिखा है

'सेठ सूदचंद मूलचंद आक़ा'

उफ़! ये भीगा हुआ अख़बार
पेपर वाले को कल से चेंज करो

'पांच सौ गाँव बह गए इस साल'

7. कांच के ख्वाब

देखो आहिस्ता चलो, और भी आहिस्ता ज़रा
देखना, सोच-समझकर ज़रा पाँव रखना
जोर से बज न उठे पैरों की आवाज़ कहीं
कांच के ख़्वाब हैं बिखरे हुए तन्हाई में
ख़्वाब टूटे न कोई, जाग न जायें देखो

जाग जायेगा कोई ख़्वाब तो मर जायेगा

8. आदत

सांस लेना भी कैसी आदत है
जिए जाना भी क्या रवायत है
कोई आहट नहीं बदन में कहीं
कोई साया नहीं है आँखों में
पावँ बेहिस हैं, चलते जाते हैं
इक सफ़र है जो बहता रहता है
कितने बरसों से कितनी सदियों से
जिए जाते हैं, जिए जाते हैं

आदतें भी अजीब होती हैं

9. एक और दिन

खाली डिब्बा है फ़क़त, खोला हुआ चीरा हुआ
यूँ ही दीवारों से भिड़ता हुआ, टकराता हुआ
बेवजह सड़कों पे बिखरा हुआ, फैलाया हुआ
ठोकरें खाता हुआ खाली लुढ़कता डिब्बा

यूँ भी होता है कोई खाली-सा- बेकार-सा दिन
ऐसा बेरंग-सा बेमानी-सा बेनाम-सा दिन

10. शरारत

आओ तुमको उठा लूँ कंधों पर
तुम उचककर शरीर होठों से चूम लेना
चूम लेना ये चाँद का माथा

आज की रात देखा ना तुमने
कैसे झुक-झुक के कोहनियों के बल
चाँद इतना करीब आया है

11. फिर कोई नज़्म कहें

आओ फिर नज़्म कहें
फिर किसी दर्द को सहलाकर सुजा ले आँखें
फिर किसी दुखती हुई रग में छुपा दें नश्तर
या किसी भूली हुई राह पे मुड़कर एक बार
नाम लेकर किसी हमनाम को आवाज़ ही दें लें

फिर कोई नज़्म कहें

12. मौसम

बर्फ पिघलेगी जब पहाड़ों से
और वादी से कोहरा सिमटेगा
बीज अंगड़ाई लेके जागेंगे
अपनी अलसाई आँखें खोलेंगे
सब्ज़ा बह निकलेगा ढलानों पर

गौर से देखना बहारों में
पिछले मौसम के भी निशाँ होंगे
कोपलों की उदास आँखों में
आँसुओं की नमी बची होगी

13. लैण्डस्केप

दूर सुनसान- से साहिल के क़रीब
इक जवाँ पेड़ के पास
उम्र के दर्द लिए, वक़्त का मटियाला दुशाला ओढ़े
बूढ़ा - सा पाम का इक पेड़ खड़ा है कब से
सैंकड़ों सालों की तन्हाई के बाद
झुकके कहता है जवाँ पेड़ से: 'यार,
सर्द सन्नाटा है तन्हाई है,
कुछ बात करो'

14. गली में

बारिश होती है तो पानी को भी लग जाते हैं पावँ
दरों दीवार से टकरा के गुज़रता है गली से
और उछलता है छपाकों में
किसी मैच में जीते हुए लड़कों की तरह

जीत कर आते हैं मैच जब गली के लड़के
जूते पहने हुए कैनवास के उछालते हुए गेंदों की तरह
दरों दीवार से टकरा के गुज़रते हैं
वो पानी की छपाकों की तरह

15. दंगे

शहर में आदमी कोई भी नहीं क़त्ल हुआ
नाम थे लोगों के जो क़त्ल हुए
सर नहीं कटा किसी ने भी कहीं पर कोई
लोगों ने टोपियाँ काटी थीं, कि जिनमें सर थे

और ये बहता हुआ, लहू है जो सड़क पर
सिर्फ आवाजें-ज़बा करते हुए खून गिरा था

16. अख़बार

सारा दिन मैं खून में लथपथ रहता हूँ
सारे दिन में सूख-सूख के काला पड़ जाता है ख़ून
पपड़ी सी जम जाती है
खुरच-खुरच के नाख़ूनों से चमड़ी छिलने लगती है
नाक में ख़ून की कच्ची बू
और कपड़ों पर कुछ काले-काले चकत्ते-से रह जाते हैं

रोज़ सुबह अख़बार मेरे घर
ख़ून से लथपथ आता है

17. वो जो शायर था चुप सा रहता था

वो जो शायर था चुप-सा रहता था
बहकी-बहकी-सी बातें करता था
आँखें कानों पे रख के सुनता था
गूँगी खामोशियों की आवाज़ें!

जमा करता था चाँद के साए
और गीली- सी नूर की बूँदें
रूखे-रूखे- से रात के पत्ते
ओक में भर के खरखराता था

वक़्त के इस घनेरे जंगल में
कच्चे-पक्के से लम्हे चुनता था
हाँ वही, वो अजीब- सा शायर
रात को उठ के कोहनियों के बल
चाँद की ठोड़ी चूमा करता था

चाँद से गिर के मर गया है वो
लोग कहते हैं ख़ुदकुशी की है |

18. क़ब्रें

कैसे चुपचाप मर जाते हैं कुछ लोग यहाँ
जिस्म की ठंडी सी
तारीक सियाह कब्र के अंदर!
न किसी सांस की आवाज़
न सिसकी कोई
न कोई आह, न जुम्बिश
न ही आहट कोई

ऐसे चुपचाप ही मर जाते हैं कुछ लोग यहाँ
उनको दफ़नाने की ज़हमत भी उठानी नहीं पड़ती !

19. क़र्ज़

इतनी मोहलत कहाँ कि घुटनों से
सिर उठाकर फ़लक को देख सको
अपने तुकडे उठाओ दाँतो से
ज़र्रा-ज़र्रा कुरेदते जाओ
वक़्त बैठा हुआ है गर्दन पर
तोड़ता जा रहा है टुकड़ों में

ज़िन्दगी देके भी नहीं चुकते
ज़िन्दगी के जो क़र्ज़ देने हों

20. घुटन

जी में आता है कि इस कान में सुराख़ करूँ
खींचकर दूसरी जानिब से निकालूँ उसको
सारी की सारी निचोडूँ ये रगें साफ़ करूँ
भर दूँ रेशम की जलाई हुई भुक्की इसमें

कह्कहाती हुई भीड़ में शामिल होकर
मैं भी एक बार हँसूँ, खूब हँसूँ, खूब हँसूँ

21. गुज़ारिश

मैंने रक्खी हुई हैं आँखों पर
तेरी ग़मगीन-सी उदास आँखें
जैसे गिरजे में रक्खी ख़ामोशी
जैसे रहलों पे रक्खी अंजीलें

एक आंसू गिरा दो आँखों से
कोई आयत मिले नमाज़ी को
कोई हर्फ़-ए-कलाम-ए-पाक मिले

22. तन्हा

कहाँ छुपा दी है रात तूने
कहाँ छुपाये है तूने अपने गुलाबी हाथों के ठन्डे फाये
कहाँ है तेरे लबों के चेहरे
कहाँ है तू आज - तू कहाँ है ?

ये मेरे बिस्तर पे कैसा सन्नाटा सो रहा है ?

23. पतझड़

जब जब पतझड़ में पेड़ों से पीले पीले पत्ते
मेरे लॉन में आकर गिरते हैं
रात को छत पर जाके मैं आकाश को तकता रहता हूँ
लगता है कमज़ोर सा पीला चाँद भी शायद
पीपल के सूखे पत्ते सा
लहराता-लहराता मेरे लॉन में आकर उतरेगा


1. अन्तर्द्वन्द
जब सभ्य समाज में इंसानी विषधर अपना फन फैलाता है
जब राजनीति का छलिया दानव लोगों को छलने आता है
जब अपना भारत बँटा हुआ हो धर्म जाति के टुकड़ों में
जब फँसा हुआ हो अन्न प्रदाता तन मन धन के दुखड़ों में
सीमा रक्षक की विधवा इंसाफ की ख़ातिर भटक रही हो
नारी शील बचाने को जब अपना मस्तक पटक रही हो
जब भूखा बचपन नंगा और बीमार दिखाई पड़ता हो
जब सूरज का तेजस्वी बेटा लाचार दिखाई पड़ता हो

जब सिंहासन की पावन पुतली अपना मोल गँवाती हो
जब प्रतिदिन वीर जवानों की अर्थी सज कर आती हो
जब ये सारा प्रश्न घुमड़ कर मन मस्तिष्क पर छाता है
इन प्रश्नों से मन ही मन लड़ना अन्तर्द्वन्द कहलाता है

2. भारत भाग्य संवारो तुम
जाति धरम का गोरखधंधा रोको इसको बंद करो
आरक्षण का खेल ये गंदा रोको इसको बंद करो
ऊँच नीच का खूनी फंदा रोको इसको बंद करो
राजनीति को मत दो चंदा रोको इसको बंद करो
युवा देश के दूर रहो तुम बहकावे के नारों से
बचे रहो तुम कुंठित कलुषित और संकीर्ण विचारों से
कुर्सी की ख़ातिर मानवता को बेच यहाँ जो आये हैं
दूर रहो उन नेताओं के छिपे हुए हथियारों से
दूर रहे इन सबसे तो क्या होगा तनिक विचारो तुम
कौशल तुममें भरा पड़ा है खुद को जरा निखारो तुम
शिक्षा को हथियार बना लो कलम हाथ में धारो तुम
उठो युवाओं आगे आओ भारत भाग्य संवारो तुम

3. सब मिल कर इनको नमन करो
जो राष्ट्रधर्म पालक थे उनका हम अभिवादन कर लें
इतिहास के पन्ने खोल हम उनको आज नमन कर लें
नमन करें हम आओ तुलसी सूर कबीर की वाणी को
पृथ्वीराज की जन्मदायिनी उस कमला क्षत्राणी को
नमन हमारा वीर शिवा को नमन है जीजाबाई को
स्वामिभक्त कुलदीपक दानी नमन है पन्नाधाय को
नमन हमारा मेवाड़ मुकुट मणि राणा की ललकार को है
जो लड़ते लड़ते टूट गई उस टीपू की तलवार को है
अंग्रेजों से लोहा लेते नमन है हर स्वाभिमानी को
जो खूब लड़ी सन सत्तावन में नमन है झांसी रानी को
जो दो गज का शैदाई था उस बहादुर शाह जफर को है
मरते दम तक आजाद रहा जो नमन उस चंद्रशेखर को है
नमन करो सुखदेव राजगुरू भगत सिंह बलिदानी को
आजादी का मोल बने जो ऐसे हर हिन्दुस्तानी को
नमन हमारा उस विधवा को जिसकी मेंहदी ताज़ी है
नमन हमारा उस ममता को जो बेटा देने पर राजी है
नमन करूँ मैं उस राखी को सीमा पर जिसका भाई है
नई नवेली उस दुल्हन को जिसने माँग सजाई है
नमन हमारा उस बचपन को जो पिता को देख न पाया है
वो पूजे जाने योग्य बुढ़ापा जिसने सर्वस्व गँवाया है
भारत माँ की रक्षा में तत्पर हर जवान नमन स्वीकार करे
भूखा नंगा अन्न प्रदाता हर किसान नमन स्वीकार करे
अपना खून पसीना देने वाले मजदूर नमन के लायक हैं
सब मिल कर इनको नमन करो ये लोकतंत्र के नायक हैं

4. कब तक लहू लजायेगा
कब तक लहू लजायेगा घाटी में जाँबाजों का
फन कब तक कुचला जायेगा ज़ालिम पत्थरबाजों का
कब तक ये सिंदूर लुटेगा क्या दिल्ली बतलायेगी
कब तक राखी अपना रक्षक यूं ही खोती जायेगी
कब तक बचपन रोयेगा पिता की गोद में जाने को
कब तक जननी तरसेगी लाल को अंक लगाने को
सुन लो तुमसे पूछ रही हैं लिपटी लाशें झंडों में
कब तक प्राण गँवायेंगे हम सत्ता के हथकंडों में
जब तक सौदेबाज़ी होगी संसद के गलियारों में
तब तक ठंडी आँच रहेगी लाल तप्त अँगारों में
दुश्मन के हाथों घाटी में जब सैनिक मारा जाता है
सुनी माँग सिसकती है और माँ का दुलारा जाता है
तब साँप सरीखे सत्ताधारी कुछ ऐसा कह जाते हैं
मरने दो जो सैनिक हैं वो मरने को ही आते हैं
सुन लो सत्ताधीशों अपना खेल ये गंदा बँद करो
कूट कपट से बाहर निकलो गोरखधंधा बँद करो
लाल किले का चक्कर छोड़ो लाल चौक भी जाओ तो
वहाँ तिरंगा फहरा कर देश का मान बढ़ाओ तो
एक के बदले दस सिर वाला वादा अपना याद है क्या
जब रोज सिपाही कटता हो फिर भारत जिंदाबाद है क्या
बहुत हुआ अब रहने दो अपनी सारी अय्यारी
सेना को आदेश थमा दो कर ले पूरी तैयारी
गद्दारों से नाता तोड़ो काटो उनकी चालों को
घाटी दे दो पूर्ण रूप से सरहद के रखवालों को
एक बार ये करके देखो हर दुश्मन फँदे में होगा
सेना पर विश्वास करो लाहौर तिरंगे में होगा

5. अब राजधर्म का पालन हो
ये मुल्क हमारा अपना है हम ही इसके संवाहक हैं
जो सर्वधर्म समभाव सिखाती उसी प्रथा के वाहक हैं
इसे बचाना ही होगा अब ज़हर घोलने वालों से
बगल में छुरी रख कर चलते राम बोलने वालों से
इसे बचाना ही होगा अब धर्म के ठेकेदारों से
किस्म किस्म के झण्डों से और उल्टे सीधे नारों से
इसे बचाना ही होगा अब ऊँच नीच के घेरों से
भ्रष्टाचार के दीमक से और नारी लाज लुटेरों से
ध्यान रहे कि देश की गरिमा किसी रूप न खण्डित हो
अब न कोई ढोंगी बाबा देश में महिमामण्डित हो
कह दो सत्ताधीशों से अब राजधर्म का पालन हो
जो कार्य सभी के हित में हों बस उनका ही संचालन हो

6. मैं माटी का पुतला मेरा प्यार माटी
मैं माटी का पुतला मेरा प्यार माटी
मेरी धड़कनों की है रफ्तार माटी

माटी ने मुझको दिया है जनम
खुदा मेरा माटी है माटी सनम
माटी ने बचपन सम्भाला मेरा
था माटी ही पहला निवाला मेरा
हवा में घुलाकर के सौंधी सी खुशबू
करती है मुझको गिरफ़्तार माटी
मैं माटी का पुतला मेरा प्यार माटी
मेरी धड़कनों की है रफ़्तार माटी

वो छुटपन में मिलकर खिलौने बनाना
वो माटी की कीचड़ से होली मनाना
मैं खेला जहाँ वो था माटी का आँगन
मेरे घाव भरती थी माटी की मरहम
खेतों से फसलों की सौगात देकर
करती है अब भी तो सत्कार माटी
मैं माटी का पुतला मेरा प्यार माटी
मेरी धड़कनों की है रफ़्तार माटी

मैं माटी से जुड़कर ही हरदम रहूँगा
माटी को ही अपना हमदम कहूँगा
अज़ल तक है मुझको ये वादा निभाना
हूँ माटी से जन्मा है माटी में जाना
नहीं मुझको कोठी महल की जरूरत
मेरा चार गज का है संसार माटी
मैं माटी का पुतला मेरा प्यार माटी
मेरी धड़कनों की है रफ़्तार माटी

7. टुकड़े टुकड़े पहरों में
कलम उठा कर हाथों में श्रृंगार नहीं लिख पाता हूँ
चूड़ी कंगन पायल की झंकार नहीं लिख पाता हूँ
नदिया चाँद सितारों पर अब गीत नहीं लिख पाता हूँ
कल कल करते झरनों का संगीत नहीं लिख पाता हूँ
बाग बगीचे चिड़िया चुरगुन ये सब कुछ तो भूल गए
सावन भादो कातिक फागुन ये सब कुछ तो भूल गए
नरिया खपड़ा लीपा आँगन ये सब कुछ तो भूल गए
पोखर में अठखेली करता अपना बचपन भूल गए
रोजी रोटी की ख़ातिर हम आ निकले जब शहरों में
अपने वक्त को बाँट दिया तब टुकड़े टुकड़े पहरों में
खुली हवा में सोना भूले बाध की खटिया भूल गई
अब गद्दों पर सोते हैं हम अपने अपने पिंजरों में
हमने बचपन खेल गुजारा खो खो और कबड्डी में
तब जाकर के ताकत पाई अपनी नाजुक हड्डी में
आज का बचपन देखो कैसे कम्प्यूटर से खेल रहा
उसका क्रीड़ाक्षेत्र बना है अब सोफों की गद्दी में
अपने छुटपन की बातें जब बच्चों को बतलाता हूँ
उनकी नन्ही आँखों में बस विस्मय ही तो पाता हूँ
अमराई कैसे दिखलाऊँ नन्हें नन्हें कौतुक को
खेतों बीच नहर का मैं विस्तार नहीं लिख पाता हूँ
कलम उठा कर हाथों में श्रृंगार नहीं लिख पाता हूँ
चूड़ी कंगन पायल की झंकार नहीं लिख पाता हूँ

8. जाने क्या क्या छूटेगा
सब कुछ अपना छूट गया है छूट गई लरिकाई भी
बचपन जिसके साथ गुजारा छूट गया वो भाई भी
माँ का प्यारा आँचल छूटा छूट गई अँगनाइ भी
पोखर ताल तलैय्या छूटे छूट गई अमराई भी
क्या क्या छूटा क्या बतलाऊँ रोजी रोटी पाने में
अपनी सारी दौलत छूटी दो सिक्कों को कमाने में
बहना बिन है सुनी कलाई डाक से राखी आती है
सारे रिश्ते पास हैं लेकिन हम तन्हा हैं ज़माने में
बीवी बच्चों का एक छोटा सा संसार बचा है बस
जब से अपना गाँव है छूटा इतना प्यार बचा है बस
लेकिन ये भी तब तक है जब तक वो शिक्षा पाते हैं
मेरा उनपर पढ़ने तक ही तो अधिकार बचा है बस
कल को वो भी पढ़ लिखकर जब अपने रस्ते जाएंगे
फिर अपना दामन खाली होगा हम तन्हा रह जाएंगे
जाने क्या क्या छूटेगा फिर खुद के विकसित होने में
हम होली ईद दिवाली पर भी शायद ही मिल पाएंगे

9. ऑनलाइन अब शोर बहुत है
देश में भ्रष्टाचार बहुत है
धर्म पे अत्याचार बहुत है
नारी से व्यभिचार बहुत है
लोकतंत्र लाचार बहुत है
माननीय का मान नहीं है
राजनीति का ज्ञान नहीं है
है काला अक्षर भैंस बराबर
तनिक मगर अभिमान नहीं है
नेताओं में चोर बहुत हैं
इनमें जूताखोर बहुत हैं

ये लाज शरम को धो बैठे हैं
बचना ये मुँहजोर बहुत हैं
बस अब जनता जाग चुकी है
कम्प्यूटर पर जोर बहुत है
सबसे बदला ले डालेगी
ऑनलाइन अब शोर बहुत है

10. सबके हों ये काबा काशी
फिर न उजड़ें भारतवासी अब कोई विध्वंस न हो
सबके हों ये काबा काशी अब दंगों का दंश न हो
तनिक हवा अब मत देना नफरत की चिंगारी को
ऊँच नीच का भेद बताते ढोंगी धर्म प्रभारी को
अफवाहों के घोड़ों पर जो सवार हो आती है
पास न अपने आने देना उस कलुषित बीमारी को
मिथ्या रूप बनाते फर्जी धर्म के जो रखवाले हैं
देखो खुद को रंग पोतकर कौवा कोई हंस न हो
फिर न उजड़ें भारतवासी अब कोई विध्वंस न हो
सबके हों ये काबा काशी अब दंगों का दंश न हो
उनसे भी तुम दूर रहो जो सत्ता सुख के पालक हैं
उन्नत भारत परिपथ के वो सबसे बड़े कुचालक हैं
ये रोज फसाद कराते हैं कुर्सी पर क़ाबिज़ रहने को
जीवननाशक उपद्रव रथ के ये नेता ही संचालक हैं
कृष्ण सरीखा ही चुनना तुम राजनीति के रक्षक को
जनमानस हृदय सिंहासन पर देखो कोई कंस न हो
फिर न उजड़ें भारतवासी अब कोई विध्वंस न हो
सबके हों ये काबा काशी अब दंगों का दंश न हो
जाँच कराने लायक अब ये धर्मध्वजा अधिकारी हैं
ठग चोर लुटेरे इनमें भी हैं ये छँटे हुए व्यभिचारी हैं
नेताओं संग ये भी मिलकर देश हमारा लूट रहे
मुल्ला पंडित नेताओं में बहुत से भ्रष्टाचारी हैं
उनको खींच उतारो जो हैं शान से बैठे कुर्सी पर
गाँधी के इस रामराज्य में अब रावण का वंश न हो
फिर न उजड़ें भारतवासी अब कोई विध्वंस न हो
सबके हों ये काबा काशी अब दंगों का दंश न हो

11. कैसी दुनिया हमारी अजब रंग है
कैसी दुनिया हमारी अजब रंग है
सबके जीने का अपना अलग ढंग है
कोई हँस कर जिए कोई रोता हुआ
देखते सब खड़े जुल्म होता हुआ
शर्म आती नहीं अब किसी बात पर
शाद हैं अब सभी अपने हालात पर
जाम पीना तो अब फख्र की बात है
अब तो डिस्को में कटती हसीं रात है
दिल में धोखा लिए सारे फिरते यहाँ
गिरते किरदार से कोई मतलब कहाँ
अब तो जीने का अपना ही अंदाज है
अब फरेबी सभी सब दग़ाबाज़ हैं
सब हैं झूठे यहाँ सब नज़र तंग हैं
कैसी दुनिया हमारी अजब रंग है

12. नयी नसल का फितूर है ये
अजब है दुनिया तुम्हारा मंजर हवस बड़ी है हवास छोटे
गुमां की आँखें हैं वहशीयाना हया के तन पर लिबास छोटे
है महफिलों में घरों की ज़ीनत गुरूर बैठा है ज़ेर ए साकी
वफा की दौलत भी लुट चुकी है नहीं बचा है इमान बाकी
नहीं है बिल्कुल अदा में रौनक बुझा पड़ा है शबाब सारा
यहाँ तो केवल चुभन है बाकी बिखर गया है गुलाब सारा
निगाह मिलने पे वो शरारे कहाँ दिखाती हैं बिजलियां अब
अपने हाथों में जाम लेकर थिरकती फिरती हैं तितलियां अब
किसी के दामन में सच्ची खुशियां बताओ मुझको बची कहाँ हैं
किसी के रुख पे हया की लाली दिखाओ मुझको सजी कहाँ है
नये जमाने भला बताओ असल में किसका कसूर है ये
तुम्हारी संगत का ही असर है नयी नसल का फितूर है ये

13. देखो मैं ही प्रथम प्रतिनिधि
देखो मैं ही प्रथम प्रतिनिधि वीरों की परिपाटी का
मैं ही योद्धा मैं ही साक्षी राणा की हल्दीघाटी का
जिस भूमि ने वीर उगाए टीपू और शिवाजी सम
जहाँ भगत सिंह पनपे थे मैं लाल हूँ ऐसी माटी का
मैं एकलव्य हूँ चढ़ा अँगूठा जिसने द्रोण का मान किया
देखो मैं वही कर्ण हूँ जिसने कवच इंद्र को दान किया
भीष्म प्रतिज्ञा कर ली जिसने संकल्पों का पुतला बन
मैं वही देवव्रत शर शय्या पर जिसने युद्ध विराम किया
राज पाट को तुच्छ समझकर वन में जाता राम हूँ मैं
दुराचार पर अंकुश हूँ और पापों पर पूर्ण विराम हूँ मैं
मैं ही भारत का वो गौरव लिखा गया जो सदियों में
लड़ा गया जो बरसों तक वो आजादी का संग्राम हूँ मैं

14. गरिमा खण्डित होती है
रोज यहाँ मानवता की गरिमा खण्डित होती है
अबला के लाज लुटेरों से बेटी दण्डित होती है
इंसानों की बस्ती में लाज शरम सब खत्म हुए
दौर नया है अब बेशर्मी महिमामंडित होती है
चुन कर जिनको लाते हो जरा देखो कितने लायक हैं
बने वही व्यभिचारी हैं जो आज यहाँ जननायक हैं
जिन्हें गुलाब हम समझे थे वो निकले पेड़ बबूलों के
आज समझ लो ये जन नेता कितने पीड़ादायक हैं
इनकी नजरों में नारी का लेश मात्र सम्मान नहीं
जननी अनुजा बेटी सम रिश्तों का कोई ज्ञान नहीं
चलो उठो संकल्प करो इनको आज बता दें हम
सहन करेंगे हरगिज़ अब वनिता का अपमान नहीं

15. इन्सान हो तुम सीखो
अब झूठ उगलते हैं अख़बार जो होते हैं
बिकते हैं यहाँ पर बद किरदार जो होते हैं
डूबे हैं सरापा जो कीचड़ में गुनाहों की
अब देख लो मजहब के रखवार वो होते हैं
वो रोज मिटाते हैं यहाँ अम्नो अमान देखो
नफरत की हथेली में हथियार जो होते हैं
बनते हैं वही रहबर यहाँ आज जमाने के
मुश्किल से जमाने की बेज़ार जो होते हैं
बचना है तुम्हे इनसे तुम कल के मुहाफ़िज हो
बनो ऐसे गुलिस्ताँ तुम गुलज़ार जो होते हैं
इन्सान हो तुम सीखो जाकर के दरख़्तों से
झुकते हैं वही अक्सर फलदार जो होते हैं

16. जयचंद नहीं हूँ
नफरत तुम्हारे पिंजरे में मैं बंद नहीं हूँ
मखमल में कोई टाट का पैबंद नहीं हूँ
सुनते हैं सभी लोग बहुत प्यार से मुझे
जो केवल तुम्हें सुकून दे मैं वो छंद नहीं हूँ
तुमसा नहीं सरापा मैं मकर ओ फरेब में
मैं शायद इसी लिए तुम्हें पसंद नहीं हूँ
मजहब की आड़ में बोते हो जहर तुम
तुम जैसा मैं इबलीस का फरजंद नहीं हूँ
कुर्सी बचाने के लिए जो गिरती हो गंद में
मैं तुम्हारी उस सियासत का पाबंद नहीं हूँ
काफिर है तु मैं दौलत ए ईमान का धनी
पर माटी से अपने मुल्क की बुलंद नहीं हूँ
मैं शब्दभेदी बाण हूँ महसूस कर मुझे
माँ भारती का लाल हूँ जयचंद नहीं हूँ

17. बुरी है रीत दुनियां की
ज़िनाकारी व मयनोशी में सारे लोग डूबे हैं
बदकारी का आलम है यहाँ मंजर अजूबे हैं
यहाँ चारों तरफ से जुल्म के तूफान उठते हैं
धरम के नाम पर देखो यहाँ शैतान उठते हैं
गुनाहों की तिजारत को यहाँ बाजार लगता है
यहाँ नापाक दौलत का बड़ा अम्बार लगता है
यहाँ की महफिलें तो रक्स से गुलजार होती हैं
मसल कर फेंक देने को यहाँ पर नार होती हैं
मिटा देते हैं बेटी को यहाँ पर कोख में माँ की
है औरत मर्द से कमतर बुरी है रीत दुनियां की
सियासत के खुदा हैं जो वो नफरत के पुजारी हैं
बहुत दौलटत जुटाकर भी वो इज्जत से भिखारी हैं

18. फर्क न होगा अंतिम क्षण में
यहाँ हिंदू मुसलमां दोनों भाई क्या इसको झुठलाओगे
धर्म के नाम पे नफरत को तुम कब तक गले लगाओगे
कब तक बाहर निकलोगे तुम ऊँच नीच के दलदल से
कब समझोगे सब हैं बराबर कब तक मेल मिलाओगे
हैं एक ही मालिक के सब बंदे धर्म है सबका इन्सानी
ये मिटने वाली दुनिया है तुम कब तक ज्ञान ये पाओगे
क्यों छीन रहे हो फ़ानी दौलत एक दूजे से लालच में
अंत सफर पर कहो मुसाफिर तुम क्या संग ले जाओगे
फर्क न होगा अंतिम क्षण में कंधे चार ही मिलने हैं
मुट्ठी बाँध के आए थे तुम हाथ पसारे जाओगे
वक़्त खतम होने पर होगा फिर दोनों का मोल बराबर
या कब्र में जाकर सोओगे या माटी में मिल जाओगे

19. अब तो ऐसा अक्सर होता है
हर शख्स यहाँ बेगाना है हर हाथ में खंजर होता है
अपने शहर की भीड़ का अब वीरान सा मंजर होता है
अपना अपना खोल है सबका घुसे हुए सब उसमें ही
झूठ फ़रेब की दुनिया में अब इन्सां पत्थर होता है
अपने अपने लोभ सभी के सबका अपना मतलब है
इस मतलब की ख़ातिर जग में जंग बराबर होता है
कैसे भला अब बच पाओगे मक्कारी के चंगुल से
अब पाँव तले है पड़ा भरोसा धोखा उपर होता है
खून बहाकर इन्सानों का मजहब हँसता रहता है
नफरत के बाजार में अब तो ऐसा अक्सर होता है
यहाँ लूट जाती है रोज मुहब्बत बेपरवाह ज़माने में
भला कहाँ अब वफा का जज्बा दिल के अंदर होता है

20. मानव के अवतार में आ
देख विधाता पहले जैसा अब तेरा संसार नहीं
तेरी प्रभुता आदम को शायद अब स्वीकार नहीं
मानवता के मानक हरगिज़ उसको अंगीकार नहीं
क्यों पहले जैसा धरती पर लेता तू अवतार नहीं
तेरे बनाए पुतले अब खुद को ही विधाता कहते हैं
तेरी बनाई दुनिया में अब कष्ट प्रदाता रहते हैं
तेरे पुजारी बेच रहे हैं ईमान धरम फुटपाथों पर
तेरा सुमिरन छोड़ के सब शैतान को दाता कहते हैं
अपनी डूबती सृष्टि बचाने माँझी तू मझधार में आ
जिसे बनाया है तुने तू अपने उस संसार में आ
मानवता का मूल्य बचाने आजा तू अविलंब यहाँ
आ तेरी जरूरत है दाता तू मानव के अवतार में आ

21. वहाँ तुम्हारी कलम जगे
तुम कल के भारत हो दरबारों का चारण मत बनना
राजनीति की कुत्सित भाषा का उच्चारण मत बनना
अपना सुख मत लेना हरगिज़ मानवता के मोल कभी
दग्ध हृदय से उठने वाली आहों का कारण मत बनना
तुम बहने वाले सागर हो पर मत बहना जज़्बातों में
तुम खुद को रौशन करते रहना अंधी काली रातों में
पुरूषार्थ तुम्हारा मानव हित में सदा समर्पण भाव से हो
उन्नति पथ पर चलो सिपाही ले राष्ट्र पताका हाथों में
ध्यान रहे अब किसी क्षेत्र में तनिक भी भ्रष्टाचार न हो
जुल्म का कोई रक्षक न हो किसी पे अत्याचार न हो
शस्त्र उठाकर शिक्षा का तुम लाज के रक्षक बन जाओ
ध्यान रहे कि गुड़ियों संग अब कोई व्यभिचार न हो
वहाँ तुम्हारी कलम जगे जब सच्चाई दण्डित होती हो
जब जुर्म की कीचड़ चौराहों पर महिमामंडित होती हो
कलुषित शतरंजी चालों से तुम अपना मुल्क बचा लेना
आवाज उठाना जब सत्ता की गरिमा खण्डित होती हो

22. भ्रष्ट व्यवस्था के शायद हम सब ही कर्ता धर्ता हैं
भ्रष्ट व्यवस्था के शायद हम सब ही कर्ता धर्ता हैं
हम झूठ की पूजा करते हैं सच्चाई के अपहर्ता हैं
कूट कपट हथियार हमारे कुंठित सोच हमारी है
हम भटके हुए विचारों के मनसे पालनकर्ता हैं
स्वार्थ सिद्धि की ख़ातिर गिरना हमको है मंजूर यहाँ
प्रेम पड़ा है कोपभवन में हम नफरत में चूर यहाँ
धर्म जाति का ताना बाना अपने उर में बुनते हैं
है पशुता भरी विचारों में हम मानवता से दूर यहाँ
अंतस का दानव जाग उठा है अच्छाई पर छाने को
हम गर्त में गिरते जाते हैं अपना वर्चस्व दिखाने को
अब दिनचर्या के जैसा है व्यभिचार हमारे जीवन में
पल पल गरिमा जूझ रही है अपनी लाज बचाने को
अब मानस मूल्यों पर जीना हमें शायद है मंजूर नहीं
इंसानी फ़ितरत दिखलाना है अब अपना दस्तूर नहीं
परिणाम बना दुष्कर्मों का है प्रलय हमारे साथ खड़ा
मिट जाए अस्तित्व हमारा वो दिन भी अब दूर नहीं

23. क्या अधिकार हमें है बोलो
जब गर्व बहुत हो अंधियारे के अंतर्मन पर छाने का
क्या अधिकार हमें है बोलो रावण तुम्हें जलाने का

अपराध तुम्हारा जितना था हम रोज ही उतना करते हैं
तुने लक्ष्मण रेखा ना लाँघी हम उसको लाँघा करते हैं
तुम शूर्पणखा की नाक के बदले सीता को हर लाए थे
हम अपनी नाक कटाने को अब रोज ही सीता हरते हैं
शौक बहुत है हमें दशानन दानवता दिखलाने का
क्या अधिकार हमें है बोलो रावण तुम्हें जलाने का

हम अपने मायाजाल में अक्सर नारी को उलझाते हैं
हम अबला को रोज यहाँ बहला फुसला कर लाते हैं
भिक्षुक का रूप बनाना भी हमको कहाँ जरूरी है
हमतो अपनी माया रचकर राम भी बनकर जाते हैं
फ़न आता है देखो हमको अगणित रूप बनाने का
क्या अधिकार हमें है बोलो रावण तुम्हें जलाने का

आज समाज मेंखुलकर देखो घूम रहे हैं अत्याचारी
भरे पड़े हैं जग में राक्षस सुनो दशानन तुमसे भारी
तुम तो दानव होकर भी अपनी गरिमा में बद्ध रहे
सुरक्षित रह गई साथ तुम्हारे लंका में भी जनकदुलारी
कहाँ था तुममें साहस बोलो हम जैसा बन पाने का
क्या अधिकार हमें है बोलो रावण तुम्हें जलाने का

अपने झूठे अहंकार वश तुम अपना सर्वस्व गँवा बैठे
तुम राक्षस कुल के सूरज थे अपना सब तेज बुझा बैठे
आज यहाँ हम हर पल अपने अहंकार में जीते हैं
पाखंड और अन्याय के बल पर हम गद्दी पर आ बैठे
छल अपना हथियार बना है सत्तासुख को पाने का
क्या अधिकार हमें है बोलो रावण तुम्हें जलाने का

24. सेना में भारत बसता है
अपने उर में पाप का तुम और शिकंजा कसते हो
अविश्वास के नागों से तुम मानवता को डंसते हो
धर्म जाति के नाम पे तुम मूर्खों को लड़वाते हो
सेना में भारत बसता है क्यों उस पर प्रश्न उठाते हो

अपनी कुटिल सियासत से लाशों के अंबार लगाये
हिन्दू मुस्लिम करके तुमने जनता के घरबार जलाये
भारत माँ की छाती पर नफ़रत की फसल उगाते हो
सेना में भारत बसता है क्यों उस पर प्रश्न उठाते हो

राजनीति की कुत्सित चालें चलना अब तुम बंद करो
तुम अन्तर्मन में झाँको अपने खुद से अन्तर्द्वन्द करो
तुम खुद पर प्रश्न उठाओ कैसे इतना गिरते जाते हो
सेना में भारत बसता हैक्यों उस पर प्रश्न उठाते हो

सोचो उस दिन क्या होगा जब सब्र की सीमा टूटेगी
कैसे खुद को बचाओगे जब गगरी पाप की फूटेगी
जागेगा जब वीर सिपाही फिर देखो क्या कर पाते हो
सेना में भारत बसता है क्यों उस पर प्रश्न उठाते हो

25. सेना का अभिमान रहे
मत फेंको हर चेहरे पर तुम राजनीति की स्याही को
वक्त अभी है रोक लो खुद पर आने वाली तबाही को
जनता को तो मूर्ख बनाकर टुकड़े टुकड़े बाँट चुके
हिंदू मुस्लिम में मत बाँटो भारत के वीर सिपाही को
है देश की रक्षा में तत्पर वो सीना ताने खड़ा हुआ
सह ठंड धूप पानी पत्थर वो सीमा पर अड़ा हुआ
जाति धर्म और जीना मरना सब कुछ उसका देश ही है
देशभक्ति का जज्बा उसके दिल के अंदर गड़ा हुआ
जिसके कारण रक्षित हो उसको मत उकसाओ तुम
अपने रक्षक को हरगिज़ मत खिलवाड़ बनाओ तुम
तुम जैसे सत्ताधीशों से हैं देश के प्रहरी श्रेष्ठ बहुत
सेना का सम्मान करो मत उसका मान गिराओ तुम
खिलवाड़ बने ना राष्ट्र सुरक्षा इसका तुमको ध्यान रहे
हो सेना पर ना छुद्र सियासत इतना तुमको ज्ञान रहे
गंदी सोच के दलदल में आकंठ डूबा लो तुम खुद को
अस्तित्व तुम्हारा मिट जाए पर सेना का अभिमान रहे

26. सब मील के पत्थर उखड़ गए
राह हमारी मुश्किल है सब मील के पत्थर उखड़ गए
ठंडी छाँव सरीखे जो थे जननायक सब बिछड़ गए
आज के जो जन नेता हैं अब वही प्रगति के बाधक हैं
अब राजनीति की संतानों में भरे बहुत शव साधक हैं
अब रोज यहाँ मानवता की गरिमा का खण्डनहोता है
हर पल अनाचार के दानव का महिमामण्डन होता है
अब लोकतंत्र के गलियारों में पाप की पूजा होती है
गूंगी बहरी इस भ्रष्ट व्यवस्था पर न्याय की देवी रोती है
अब अन्यायी और पापी का होता है सत्कार बहुत
यहाँ झूठ का परचम ऊँचा है सच्चाई है लाचार बहुत
कौन यहाँ है समझने वाला अब जनता की जरूरत को
संसद का मंदिर तरस रहा है एक अखण्डित मूरत को
अब जनसेवा के भाव को भूले देखो सारे खद्दरधारी
अपनी पूंजी बढ़ाने ख़ातिर सत्ता में आते हैं व्यापारी
खूनी चोर उचक्का होना अब कोई अभिशाप नहीं है
व्यभिचार यहाँ अब फैशन है कोई घिनौना पाप नहीं है
नैतिकता आदर्श समर्पण फंस गए सियासी दलदल में
अब लालच के इंसानी गिरगिट रंग बदलते पलपल में
हर एक की नीयत ओछी है और धोखा देना आम यहाँ
सब छल से तरक्की करते हैं अच्छाई है नाकाम यहाँ
अब नफरत की पूजा होती है और मानवता बीमारी है
इन गोरखधंधों में फंसकर भारत की तरक्की हारी है

27. दुःशासन के अवतार बहुत
क्यों खूनी पंजा जकड़ रहा है आज किसी बेचारी को
क्यों मन का राक्षस लूट रहा है अबला की लाचारी को
क्यों पावन धरती की छाती पर नाच रहे व्यभिचारी हैं
क्यों इंसानी पशुओं के हाथों अब शील गंवाती नारी है
क्यों शक्ति स्वरूपा कृष्ण सखी अब भी सतायी जाती है
केश पकड़ कर भरी सभा में खींच के लायी जाती है
क्यों बेटी के निश्छल मन के अरमान उजाड़े जाते हैं
क्यों मानवता की मर्यादा के प्रतिमान उखाड़े जाते हैं
क्यों अन्तर्मन का केशव अब चुपचाप खड़ा रह जाता है
कृष्णा की लाज बचाने मन का माधव आ नहीं पाता है
क्यों ममता शंकित रहती है अब अपनी ही परछाईं से
क्यों राखी को डर लगता है खुद अपनी ही कलाई से
क्यों सभ्य समाज में होता है नारी पर अत्याचार बहुत
घर घर में क्यों पड़े हुए हैं दुःशासन के अवतार बहुत

28. कुछ मोल गंवाने ही होंगे
धृतराष्ट्र आज भी फंसा हुआ है पुत्रमोह के घेरे में
अब भी अन्तर्मन उलझ रहा है कुटिल दाँव के फेरे में
आज भी चौपड़ सजती है और चीरहरण भी होता है
दुर्योधन के दरबारों में लज्जा का क्षरण भी होता है
अनाचार के चक्रव्यूह में कई अभिमन्यु मिट जाते हैं
छल के सघन उपासक अब भी महारथी कहलाते हैं
भीष्म पड़े मजबूर हैं अब भी सिंहासन की रक्षा को
अन्तिम कुरू को ताक रही है कृष्णा अपनी सुरक्षा को
अपमानित करने को पापी उसके वस्त्र को खींच रहा है
द्यूत सभा का सन्नाटा अब भी अनाचार को सींच रहा है
सुमिरन करती है असहाय द्रोपदी चक्र सुदर्शन धारी का
कलियुग में माधव भी नहीं आते सम्मान बचाने नारी का
इस युग में पांचाली को हाथों में हथियार उठाना ही होगा
भरी सभा में दुःशासन को चण्डी रूप दिखाना ही होगा
अब सहन शक्ति संकोच सरीखे कुछ मोल गंवाने ही होंगे
उसे खुद के दाँव लगाए जाने पर खुद प्रश्न उठाने ही होंगे

29. अब राष्ट्रध्वजा फहराने दो
सब धर्मों का भेद मिटाकर एक धर्म इंसानी हो
भारत माँ कीसंतानेंअब केवल हिंदुस्तानी हों
साम्प्रदायिकझगड़ों कारुकना बहुत जरूरी है
मानवता कीलाज बचाना अब अपनी मजबूरी है
पाखण्डी ठेकेदारों का अरमान धरा रह जाने दो
धर्म पताका रखो किनारे राष्ट्रध्वजा फहराने दो

पुतले हो जिस माटी के वो माटी भी संस्कारी है
फिर हर पल क्यों लज्जित होतीलाज हमारी है
जिस भारत में सदियों से ही नारी पूजी जाती है
क्या कारण है आज यहाँ माता की कोख लजाती है
नारी की लाज के चूनर को निष्कलंक लहराने दो
व्यभिचार का झण्डा फेंको और राष्ट्रध्वजा फहराने दो

किस कारण रक्षक के उपर ये पत्थरबाजी चलती है
घाटी में अलगाव की डायन अपना जहर उगलती है
उस फण को क्यों दूध पिलाना जो कुचले जाने लायक है
सेना पर होती नापाक सियासत भारी पीड़ादायक है
कशमीर हमारा अभिन्न अंग है दुनिया को समझाने दो
लाल चौक की छाती पर भी अब राष्ट्रध्वजा फहराने दो

30. उनके जीवन का सुख राम के पास हो
हँस के जीवन जियें कामिनी कंचना
निरादर न हो उनका हरगिज़ यहाँ
पूरी उनके हृदय की सभी आस हो
उनको पुरुषों से रक्षा का विश्वास हो
ना मिले कोई रावण उन्हें अब यहाँ
उनके जीवन का सुख राम के पास हो
ना लगे दाँव पर अब कोई द्रोपदी
जीते शकुनि न अब वेदना लाज की
खींच ले चीर नारी के तन से कोई
ऐसी ज़ुर्रत न हो अब किसी राज की
अब किसी राधिका को उदासी न हो
अब कोई सुंदरी देवदासी न हो
रोक लो अपनी कुत्सित प्रवृति मनुज
अब कोई नन्दिनी फिर रुआँसी न हो
अब भय मुक्त होकर रहे आत्मजा
निरादर न हो उनका हरगिज़ यहाँ

31. बस एक जटायु के जैसा
क्यों भारत गौरव गाथा को खण्डित करते जाते हो
निरपराध क्यों अबला को दण्डित करते जाते हो
कोई एक भूभाग बता दो जहाँ सुरक्षित नारी है
गली गली चौराहे पर घर घर में व्यभिचारी हैं
कुचले जाने पर भी क्यों दोष है सारा औरत का
क्या पाठ पढ़ाया है तुमने कभी बेटों को भी गैरत का
जब भरी सभा में लाज लुटी तो काष्ठ बने क्यों बैठे थे
पुत्र मोह से बँधे हुए धृतराष्ट्र बने क्यों बैठे थे
सिंहासन स्वमूल अर्थ में जो सिंहों का आसन है
हाय यहाँ दुर्भाग्य हमारा अब गिद्धों का शासन है
गिद्ध भी उसको कैसे कह दें जो गिद्ध से नीच ही जीता हो
गिद्ध प्राण न्योछावर कर बैठा था जब चला बचाने सीता को
बस एक जटायु के जैसा हम सिखला पाते संतानों को
तो हर बेटी निर्भय हो जी लेती अपने सब अरमानों को

32. यहाँ बेईमानी दुष्कर्म नहीं
ये राजनीति की बस्ती है
यहाँ मानवता भी सस्ती है
है झूठ का काला राज यहाँ
सच्चाई पड़ी सिसकती है
सब उल्टे सीधे काम यहाँ
हैं लोग बहुत बदनाम यहाँ
जो जितना भारी लुच्चा है
है उसका उतना नाम यहाँ
अब ज़ुल्मी खद्दर वाले हैं
तन उजला है मन काले हैं
तुम अपनी आन बचा लेना
ये सब कुछ लूटने वाले हैं
जो जन नेता कहलाते हैं
कुछ ऐसी आग लगाते हैं
अपना मतलब साधने को
हमें आपस में लड़वाते हैं
यहाँ इनका कोई धर्म नहीं
इनमें थोड़ी भी शर्म नहीं
येमुल्क लुटे तो लुट जाए
यहाँ बेईमानी दुष्कर्म नहीं

33. बस इसको अविरल रहने दो
पतित पावनी गंगा अब वो निर्मल धार गवां बैठी
वो पाप मिटाना भूल गई अब मैला धोने आ बैठी
इसको पूजने वालों का ही दोष यहाँ पर सारा है
उनके कारण ही तो दूषित भागिरथी की धारा है
हम जो इसकी धारा में पूजा के पुष्प बहाते हैं
वही फूल सड़ गल कर फिर कचरा बन जाते हैं
फेंक रहे हैं खुद का कचरा देखो इसके किनारों पर
कोई अंकुश नहीं हमारा मलमोरी की धारों पर
देखो ये अपशिष्ट हमारा इसको मैला करता है
उद्योग जगत का कचरा भी इसमें ही तो बहता है
गंगा की बाधाएँ काटो कलकल इसको बहने दो
निर्मल खुद हो जाएगी बस इसको अविरल रहने दो

34. ये फिर तुमको फुसला लेंगे
ये खद्दर वाले मदारी हैं सब अपना खेल दिखा देंगे
लूट के सारा भाईचारा तुम्हें आपस में लड़वा देंगे
बच के रहना तुम इनसे ये बाजीगर हैं बहुत बड़े
ये धर्म का पासा फेंकेंगे और दंगे भी करवा देंगे
तुम अपने खून पसीने से दो जून की रोटी खाते हो
बस इनको कुर्सी मिलने दो ये भुखमरी तक ला देंगे
सब अत्याचारी दानव ही अब कुर्सी पर आ बैठे हैं
अपने स्वार्थ की ख़ातिर तुमको सूली पर लटका देंगे
तुम भूख गरीबी बेकारी की इनसे चर्चा मत करना
वरना ये सब कट्टर बनकर मंदिर मस्जिद ला देंगे
पाँच बरस तक नहीं किया कुछ मुँह सुजाए बैठे हो
बस आम चुनावों से पहले ये फिर तुमको फुसला लेंगे

35. खेल तुम्हारा ठीक नहीं
बचपन के आंगन में इठलाती किलकारी से मत खेलो
युवा भविष्य को आँख दिखाती बेकारी से मत खेलो
किसी अबला के रोते आँचल की लाचारी से मत खेलो
तुम जनमानस के उर में बसी हुई चिंगारी से मत खेलो
मत खेलो धर्म का खेल यहाँ किसी सच्चे भारतवासी से
मत खेलो दीन किसानों की आँखों में बसी उदासी से
सीमा रक्षा की ख़ातिर जो आठ प्रहर है अडिग खड़ा
सर्वस्व त्याग कर आया है जो मत खेलो उस सन्यासी से
मजलूमों और लाचारों से ये खेल तुम्हारा ठीक नहीं
जाति धरम के हथियारों से ये मेल तुम्हारा ठीक नहीं
अब खेल तुम्हारा ठीक नहीं है जनता के जज्बातों से
ऊँच नीच के अंगारों से ये खेल तुम्हारा ठीक नहीं

36. पत्थर का बदला गोली हो
दशकों से बारूद घुला है काशमीर की माटी में
अलगावी विषबेल पनपती है बर्फीली घाटी में
तंग सियासत दूर खड़ी मुस्काती है मक्कारी से
सेना प्रतिक्षण जूझ रही है बंधन की लाचारी से
संगीनें खामोश पड़ी हैं तन पर पत्थर खा कर भी
दहशत छुट्टा घूम रही है घाटी में आग लगा कर भी
काली आँधी नफरत की क्यों मानवता से खेल रही
अलगाववाद का दंश भला क्यों सरकारें झेल रहीं
सत्ता ही मौका देती है आँगन में मातम पुर्सी का
आतंकवाद से बढ़कर है खेल ये शायद कुर्सी का
बहुत सहा अब घाटी के गद्दारों को सबक सिखाना है
मुकुट रूप कश्मीर को अब काँटों से मुक्त कराना है
अब सेना को बंधनमुक्त करे ये सत्ता की मजबूरी है
पत्थर का बदला गोली हो घाटी में बहुत जरूरी है

37. अब गोविंद न आएंगे
बहुत बनी तुम लक्ष्मी जैसी अब दुर्गा का रूप धरो
अपने हर अपराधी का तुम उठकर खुद संहार करो
तुम काली चंडी बन कर के तांडव अपरम्पारकरो
पाप नाशिनी बनो भवानी कुछ ऐसा श्रृंगार करो
शस्त्र उठाकर टूट पड़ो अपना सम्मान बचाने को
अब गोविंद न आएंगे तुम्हरी लाज बचाने को
चक्र सुदर्शन खुद ही धारो दुष्टों का संहार करो
खड्ग संभालो हाथों में व्यभिचारी पर वार करो
जो हृदय कँपा दे दानव का तुम ऐसी हुंकार भरो
उठो भवानी दुर्गा बनकर पाप का तुम प्रतिकार करो
चंडी बनकर खड़ी रहो तुम खुद पर आँच न आने दो
अब गोविंद न आएंगे तुम्हरी लाज बचाने को
बहुत सह लिया अत्याचार अब उठकर ललकार भरो
फूलन को आदर्श बना लो हाथों में हथियार धरो
दुःशाशन की बाँह उखाड़ो उसपर कठिन प्रहार करो
खुद ही अपनी नाव संभालो खुद का बेड़ा पार करो
खुद ही खुद को सज्य करो तुम अपना मान बढ़ाने को
अब गोविंद न आएंगे तुम्हरी लाज बचाने को

38. तुम्हें लड़ने का अधिकार नहीं
खुद आप हैं बैठे महलों में माता घुमे सड़कों पर
जो माँ का दूध लजाते हैं धिक्कार ऐसे लड़कों पर
गौ सेवा के नाम पे जो आडम्बर फैलाते हैं
खुद उनके ही आँगन से गोवंश निकाले जाते हैं
सड़कों पर वो झुण्ड बनाकर दुर्घटना के कारक हैं
कूड़ा कचरा खाकर वो खुद अपने ही संहारक हैं
आपस में ही लड़ते हैं जनता को दुख पहुँचाते हैं
कभी किसी वाहन से लड़कर अपने पाँव तुड़ाते हैं
आवाज़ लगाता हूँ उनको जो काट रहे इंसानों को
गोरक्षा का संकल्प लिए गऊ माता की संतानों को
मात्र एक गोवंश को तुम अपनाकर जरा दिखाओ तो
बस छुट्टा घूम रहा इक बछड़ा अपने घर ले जाओ तो
कर न सके जो ऐसा तो तुम मानो कि अतिवादी हो
गो हत्या के पाप के तुम भी उतने ही अपराधी हो
गोवंश खुला क्यों छोड़ते हो क्या गौमाता से प्यार नहीं
जब तक जुर्म ये करते हो तुम्हें लड़ने का अधिकार नहीं

39. सच्चा धर्म वही होता है
बरसों से हम झेल रहे हैं मज़हब की परिपाटी को
पल पल दूषित करते हैं हम भारत माँ की माटी को
धर्म के नाम पे कट्टरता के विषबेल उगाए जाते हैं
क्यों ईष्ट हमारे अंतस के सड़कों पर लाए जाते हैं
जाति धर्म हथियार बना है पाखंडी ठेकेदारों का
मांस नोंचने झुण्ड खड़ा है खादी में रंगे सियारों का
अब मंदिर मस्जिद गुरुद्वारों का भेद मिटे मजबूरी है
उन्नत भारत के हित में बस राष्ट्रधर्म ही जरूरी है
धर्म हमारी निजता है जो हृदय में धरने लायक है
चौराहों पर मजहब लाना कुंठा का परिचायक है
सत्ता लोलुप तंग सियासत आज बनी हत्यारी है
बस्ती बस्ती आग लगाती मजहब की चिंगारी है
इस चिंगारी को भड़काना सत्कर्म नहीं हो सकता है
जो नफरत फैलाता हो वो धर्म नहीं हो सकता है
जो प्रगति पथ पर ठोकर ना हो धर्म वही कहलाता है
सच्चा धर्म वही होता है जो अन्तर्मन सहलाता है

40. देश हमारा लूट लियो
थोड़ा सा छल थोड़ी नफरत थोड़ी सी मक्कारी लो
ठग विद्या का ज्ञान लो थोड़ा थोड़ी सी अय्यारी लो
झूठे वादों का गट्ठर लो जनता को मूर्ख बनाने को
थोड़ी सी चतुराई लो फिर उसमें अवगुण भारी लो
एक साथ सब खल में डालो ठीक सबको कूट लियो
अब सारा मिश्रण भेजे में रख देश हमारा लूट लियो

बेशर्मी की सारी किस्में खोज खाजकर ले आना
भ्रष्टाचार की गठरी संग तुम घूस माँगकर ले आना
जनता से लो खून पसीना गाय भैंस से चारा लो
बेईमानी का काला मोती खूब छानकर ले आना
इन सब का एक घोल बनाकर छोटा छोटा घूंट पियो
नशा चढ़ाकर ताकत का तुम देश हमारा लूट लियो

नेता बनने की ख़ातिर तुम बस इतना सा कष्ट करो
कालाधन को गले लगाकर रंगभेद को नष्ट करो
जाति धर्म का जहर लो थोड़ा थोड़ी सी गद्दारी लो
पोत के अपने मुँह पर कालिख तुम खादी को भ्रष्ट करो
जो विरोध में कुछ भी बोले उनको जमकर कूट लियो
झार के खद्दर अपने तन पर देश हमारा लूट लियो

41. अब आज का भारत ऐसा है
मानव पहले ही सच्चा था
वो आदि युगीन ही अच्छा था
जब जात पात कुछ बने न थे
जब धर्म के झंडे तने न थे
जब ऊँच नीच का ज्ञान न था
जब ताकत पर अभिमान न था
जब सत्ता मद में चूर न था
छल करने को मजबूर न था
फिर थोड़ी बुद्धि प्रखर हुई
और छलिनी माया मुखर हुई
कुछ लोग बढ़े अगुआई में
गिर गए धर्म की खाई में
अब अंधा एक व्यापार चला
डर का कारोबार चला
समता के वृक्ष को काट दिया
सबको वर्णों में बाँट दिया
खेल ये गंदा चल निकला
धर्म का धंधा चल निकला
फिर कालचक्र कुछ और चला
अब राजतंत्र का दौर चला
राजा को अभिमान हुआ
खुद में ईश्वर का भान हुआ
स्वयं को सब कुछ जान लिया
जनता को सेवक मान लिया
वो घमंड में अपने यों ऐंठा
कि राज्य के टुकड़े कर बैठा
अपना अभिमान बढ़ाने को
भाई को धूल चटाने को
जा मिला वो बाहरवालों से
लड़ बैठा खुद घरवालों से
फिर जुर्म बड़ा संगीन हुआ
अपना भारत आधीन हुआ
अभिमान गया सम्मान गया
फिर सत्ता का सोपान गया
जब जुल्मो सितम से चूर हुए
तब हम लड़ने को मजबूर हुए
मरने का संकल्प उठा बैठे
हम लाखों शीश गवां बैठे
जब बहुत लड़े आजादी ली
और बँटवारे की बर्बादी ली
फिर मुश्किल से हम खड़े हुए
कब तक रहते यूं पड़े हुए
सब भूल भाल कर दिल का छाला
उठकर हमने देश संभाला
रजवाड़ों से राज लिया
तब लोकतंत्र को जन्म दिया
जब लोगों की सरकार बनी
कुछ उन्नति की रफ़्तार बनी
फिर लालच ने वो कर्म किया
राजनीति को जन्म दिया
इसको मारो उसको काटो
जाति धर्म में सबको बाँटो
स्वार्थ सिद्धि मेंअंधे होकर
कूट कपट में गंदे होकर
मानवता से व्यभिचार किया
हमने खुलकर भ्रष्टाचार किया
यहाँ शहर भी जंगल जैसा है
अब आज का भारत ऐसा है

42. उनका शोषण होता है
सर्वाधिक अपमान वहीं जहाँ कन्या पूजन होता है
सीता राधा की धरती पर उनका शोषण होता है

पर निंदा के कारण वो वनवास को भेजी जाती है
हर पल उसके जीवन में इक अग्नि परीक्षा आती है
भरी सभा में बालों से वो खींच के लायी जाती है
यहाँ द्यूत में खुद की भार्या दाँव लगाई जाती है
अपनों के कारण नारी का अपमान प्रतिक्षण होता है
सीता राधा की धरती पर उनका शोषण होता है

सारे नाते तोड़ चली जो अपना संसार बसाने को
बाबुल का घर छोड़ दिया अपना घर बार बनाने को
रोकर जिसने पीहर छोड़ा अपना ससुराल हँसाने को
सात जनम की कसम उठाकर आ गई साथ निभाने को
दहेज की ख़ातिर उसपर भी जुल्म यहाँ पर होता है
सीता राधा की धरती पर उनका शोषण होता है

युगों युगों से दलित रही है नारी आज भी वैसी है
आदिम युग में जैसी थी अब भी बिल्कुल वैसी है
पढ़ी लिखी ये दुनियां देखे उसकी हालत कैसी है
आज भी कुचली जाती है वो पाँव की जूती जैसी है
अबला से व्यभिचार आज कल देखो क्षण क्षण होता है
सीता राधा की धरती पर उनका शोषण होता है

43. फिर अपना झण्डा गड़ा रहेगा
क्यों फूलों की घाटी में अलगाव की सोच प्रभावी है
राष्ट्र ध्वजा के उपर काहे राज्य का झण्डा हावी है
क्यों देशद्रोह की कालिख माथे पर सज्जित होती है
क्यों गरिमा पहरेदारों की पत्थर से लज्जित होती है
भारत से भाव पृथकता का क्यों घाटी में संचित है
पावन छाया से तीन रंगों की लालचौक क्यों वंचित है
क्यों झीलों के अन्तर से जहरीला नीर निकलता है
बर्फीली चट्टानों के भीतर क्यों बारूद उबलता है
क्यों पुष्पों का श्रृंगार यहाँ पर बन्दूकों ने नष्ट किया
धरती की जन्नत का गौरव आतंकवाद ने भ्रष्ट किया
क्यों नफ़रत के जहरीले बिच्छू यहाँ अमन से खेल रहे
काले नागों का दंश भला हम क्यों दशकों से झेल रहे
बात चीत पर आधारित अब समझौते के हालात नहीं
कशमीर समस्या सुलझाना सत्ता के बस की बात नहीं
बस सेना को अधिकार मिले अब पूर्ण रूप से घाटी का
फिर नहीं बचेगा एक भी दुश्मन भारत माँ की माटी का
हर मैदान शिखर चौराहे पर फिर अपना झण्डा गड़ा रहेगा
आतंक का आका शीश नवाए कदमों के नीचे पड़ा रहेगा

44. याद वही रह जाएगा
मुट्ठी बाँध के आने वाले तुम हाथ पसारे जाओगे
अन्त सफर पर लोगों के काँधों के सहारे जाओगे
कोठी बंगले मोटर गाड़ी काम नहीं कुछ आना है
महंगे वस्त्राभूषण को भी यहीं त्याग कर जाना है
सुख सुविधा की सारी चीजें जग में आनी जानी है
गर्व है जिसकी ताकत पर वो देह नष्ट हो जानी है
धन दौलत और नाता रिश्ता यहीं धरा रह जाएगा
चल दोगे तुम निपट अकेले जब भी काल बुलाएगा
अंत समय में साथ न होगा कुत्सित हेरा फेरी का
उस दिन कोई मोल न होगा धन दौलत की ढेरी का
जीवन संगी सखा सहोदर किसको साथ में जाना है
अंत क्रिया के बाद सभी को मुड़कर पीठ दिखाना है
ले जाओगे इस दुनिया से दो ही चीजें साथ में तुम
पाप पुण्य की एक एक गठरी पाओगे सौगात में तुम
उस क्षण में छल छद्म तुम्हारा कोई काम न आएगा
प्रारब्ध तुम्हारा कैसा हो ये गठरी का भार बताएगा
अपने ऊँचे कुल का झूठा ये अभिमान जताना क्या
अपनी सुंदर काया पर खुद मोहित हो इतराना क्या
इस ऊँचे कुल का दर्प तुम्हारा ये संसार भुला देगा
वक्त का थप्पड़ बलिष्ठ देह का सब श्रृंगार मिटा देगा
सब कुछ माटी हो जाएगा माटी में मिल जाने पर
सत्कर्म तुम्हारे अमर रहेंगे दुनियां छोड़ के जाने पर
सांसों की डोरी टूटेगी तो कुछ साथ नहीं रह पाएगा
जो अच्छे कर्मों का फल होगा याद वही रह जाएगा

45. सुनो राधिका अब कन्हैया नहीं हैं
सुनो राधिका अब कन्हैया नहीं हैं
मधुर बाँसुरी के बजैया नहीं हैं
नहीं राधा रानी है ग्वालों की टोली
कदम डाल पर है न चिड़ियों की बोली
तुमको न अब प्यारी सखियाँ मिलेंगी
करोगी बताओ तो किससे ठिठोली
वो जमुना के तीरे कदम भी नहीं हैं
हरी घास चरती वो गइया नहीं हैं
सुनो राधिका अब कन्हैया नहीं हैं
मधुर बाँसुरी के बजैया नहीं हैं
वृन्दावन में मचाया था जिसने कोलाहल
जमुना में घोला था अपना हलाहल
जो विषधर था पहले रमण द्वीप वासी
बिखेरे हुए था चतुर्दिक उदासी
महानाग के फन को कुचला था जिसने
गरल राज के वो नथैया नहीं हैं
सुनो राधिका अब कन्हैया नहीं हैं
मधुर बाँसुरी के बजैया नहीं हैं
सर्वपापहारी यहाँ पर नहीं हैं
वो बाँके बिहारी यहाँ पर नहीं हैं
कुछ भी नहीं है तुम्हारे समय का
कलियुग है राधे ये द्वापर नहीं है
नन्द बाबा यशोदा की आँखों के तारे
बलभद्र के प्यारे भईया नहीं हैं
सुनो राधिका अब कन्हैया नहीं हैं
मधुर बाँसुरी के बजैया नहीं हैं

46. अपना हिंदुस्तान लिखो
लोकतंत्र ने बागडोर दी चोरों और डकैतों को
भारत माँ को सौंप दिया आदमखोर लठैतों को
लोकतन्त्र का लड्डू सबने आधा आधा बाँट लिया
सभी दीमकों ने मिल कर के मुल्क हमारा चाट लिया
अब तो पैमानों में अपने वो खून मिलाकर पीते हैं
गाय भैंस का दूध नहीं अब चारा खाकर जीते हैं
इनका कोई दोष नहीं है अपनी गलती सारी है
हम चुन कर इनको लाते हैं बस ये भूल हमारी है
सोचो लेकिन क्या कर लेंगे हम भी हैं लाचार बहुत
बदतर से बद चुनना है हमको भी दुश्वार बहुत
हमने बरसों बहुत सहा अब रोकें इनके नर्तन को
सब मिल कर आवाज़ उठाएं संविधान परिवर्तन को
लोकतंत्र के आसन का अब ऐसा अधिकारी हो
जिसपर कोई दाग न हो बस वो ही सत्ताधारी हो
तय कर लो सिंहासन पर व्यभिचारी का अधिकार न हो
दामन जिसका दागी हो वो नामांकन स्वीकार न हो
अनपढ़ एक न आगे आएं पढ़े लिखों पर शासन को
कोई शिक्षित ही ले आओ सचिवालय से संभाषण को
मुल्क तरक्की कर जाए ऐसा एक विधान लिखो
विकसित स्वछ सुरक्षित अपना हिंदुस्तान लिखो

47. समुचित मोल चुकाया जाए
आजादी के बाद मुल्क ने सत्तर बरस गुजारा है
पर किसान के आँगन में आज भी वो अँधियारा है
खेतों में अन्न उगाने को जो दिन रात झुलसता है
एक जून की रोटी को हलधर का लाल हुलसता है
अब भी उसको खेती में कर्जा ही लेना पड़ता है
फिर उसी महाजन कोठी को सब वापस देना पड़ता है
कठिन परिश्रम बाद भी जब ना कर्ज चुकाया जाता है
तब भोर की धुंधली बेला में फंदे पर पाया जाता है
आज ज़रूरत है देश में ऐसा एक विधान बने
कर्ज समस्या ना बन पाए इसका एक निदान बने
समुचित मोल चुकाया जाए भारत अन्न विधाता को
समय से बिजली पानी हो तब सम्पन्न किसान बने

48. उससे बढ़कर कौन भला है
मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे और गिरजाघर पूजे जाते हैं
आग हवा पानी मिट्टी और पत्थर पूजे जाते हैं
सबकी अपनी पद्धतियां हैं पूजन और नमाजों की
अपने अपने ईष्ट सभी के घर घर पूजे जाते हैं
आज मगर कुछ ऐसा कर लें छोड़ के पूजन विधियों को
सब से ऊपर ले आएं अब राष्ट्र की संचित निधियों को
धर्म ध्वजा अब छत पर टाँगें हाथ सभी के तिरंगा हो
सब मिल कर संकल्प उठा लें निर्मल जमुना गंगा हो
प्रथम पूज्य हो वीर सिपाही जो सीमा पर अड़ा हुआ
जलकर रेगिस्तानों में और बर्फ में जमकर खड़ा हुआ
जो प्राण न्योछावर कर देता है सबका संसार बचाने को
उससे बढ़कर कौन भला है सबमें पूजे जाने को

49. अपना कोई मोल नहीं
सांसों के जारी रहने तक तो फर्ज निभाना होता है
जो कुछ पाते हैं जीवन से वो कर्ज चुकाना होता है
बच्चों की फ़रमाइश भी तो अपनी जिम्मेदारी है
जब रूठ रहा हो जिद्दी बचपन उसे मनाना होता है
सब नाज़ उठाने पड़ते हैं उस नाजु़क नखरेवाली के
उसकी मीठी धुनपर हमको साज़ बजाना होता है
सबकी चाहत पूरी हो बस इतना सा अरमान यहाँ
इस चाहत के घेरे में बस अपना ताना बाना होता है
है जीवन अपना कैद यहाँ पर रिश्तों की जंजीरों में
जग में हमको इन रिश्तों का साथ निभाना होता है
मिटने वाली इस दुनिया में अपना कोई मोल नहीं
यहाँ अपनी अपनी बारी पर सबको जाना होता है

50. तेरे इश्क में वफा की ऐसी मिसाल दूँ मैं
खुशियां जमाने भर की झोली में डाल दूँ मैं
तेरी सारी मुश्किलों को हँसकर संभाल दूँ मैं
नाजुक से पाँव में गर चुभ जाए कोई काँटा
तो आ बैठ पास मेरे उसको निकाल दूँ मैं
आँखों में बेबसी के कभी आएं न तेरी आँसू
मुस्कान इन लबों पर आ बेमिसाल दूँ मैं
अरमान तेरे दिल का हर हाल में हो पूरा
आ सारे ख्वाब तेरे हकीकत में ढाल दूँ मैं
बरसों में जो बना है तिनके बटोर कर के
चाहत का वो घरौंदा आजा कमाल दूँ मैं
मैं साँसों के डूबने तक बस तेरा ही रहूंगा
तेरे इश्क में वफा की ऐसी मिसाल दूँ मैं

51. हम किसके क्या क्या होते थे
खुश होता था अपना मन कागज़ की नाव चला कर के
जब सारा खजाना मिल जाता था गुल्ली डंडा पा कर के
मन भरता था कहाँ भला तब चोर सिपाही खेल के भी
हम पानी संग अठखेली करते पोखर ताल में जा कर के
दादा दादी के हम प्यारे उनकी आँख का नूर थे हम
बचपन कितना प्यारा था जब दायित्वों से दूर थे हम
क्या बतलाएं छुटपन में हम किसके क्या क्या होते थे
अम्मा के थे किसन कन्हैया बाबा के मयूर थे हम
अब फूस का छप्पर पड़ी मड़ईया कच्चा आँगन नहीं रहा
अब थाली में चंदा दिखलाता जल का दर्पण नहीं रहा
अब नहीं रहे वो खेल खिलौने रौनक मस्ती नहीं रही
अब छूट गए सब संगी साथी प्यारा बचपन नहीं रहा

52. मुझे आदमी का ख़िताब दे
तेरी रहमतों को पढ़ा करूँ मुझे कोई ऐसी किताब दे
मुझे अपना बंदा कुबुल कर मेरी हसरतों का जवाब दे
मेरी चार पल की है ज़िन्दगी यहाँ बेशुमार हैं गलतियां
मेरी ख़ामियों को जो ढक सके मुझे एक ऐसा नकाब दे
तारीकियां हैं यहाँ बहुत इन्हें दूर कर मुश्किलकुशां
मुझे रौशनी का शज़र न दे बस एक नन्हा चिराग दे
मेरा मुल्क सारा सुलग रहा है नफरतों के अज़ाब में
अमन की दौलत मेरे खुदा मेरे मुल्क को बेहिसाब दे
रहूँ मुसल्लम मैं दीन पर तौफ़ीक़ मुझको तु कर अता
मेरे पाक दिल की है आरजू मुझे आदमी का ख़िताब दे

53. मुझको तुम मजदूर रख लो
प्यार से इक बार देखो ये जहाँ रुक जाएगा
नाच उठेगी जमीं और आसमां झुक जाएगा
ना गिराओ इस कदर आँखों से अपनी बर्क़ भी
इस समंदर का कलेजा आँच से फूँक जाएगा
ऐ हसीना बाज़ आओ जुल्म अपना रोक लो
वरना ये आशिक़ बेचारा जान से चुक जाएगा
ये अदाएँ ये जफ़ाएँ हुस्न ओ जवानी ये सितम
मुझको तुम मजदूर रख लो बोझ ये उठ जाएगा

54. तुमसे बेहतर कौन करे है
नैन मिलाकर नैन चुराना तुमसे बेहतर कौन करे है
नैनों से ही सब कह जाना तुमसे बेहतर कौन करे है
अपने दिल की सब बातें तुम कह देती हो इशारों में
चुप रह कर भी प्यार जताना तुमसे बेहतर कौन करे है
जुल्फ झटककर हौले से वो ढक लेना रुखसारों को
बदली में यूं चाँद छिपाना तुमसे बेहतर कौन करे है
लम्हा लम्हा धड़कन में तुम मेरी उतरती जाती हो
चुपके से यूँ दिल में समाना तुमसे बेहतर कौन करे है
अब जाम पिला दो आँखों से हम मदहोशी में डूबें तो
नजरों से यूँ जाम पिलाना तुमसे बेहतर कौन करे है
हया के भार से झुकी हैं पलकें गाल गुलाबी शर्मीले
आहिस्ते से यूँ शरमाना तुमसे बेहतर कौन करे है

55. मैं तेरा दीवाना नहीं रहा
इश्क़ की रौनक नहीं रही उल्फ़त का जमाना नहीं रहा
तुम मेरी पुजारन नहीं रही मैं तेरा दीवाना नहीं रहा

वो चाँद सा मुखड़ा खिड़की में मैं जिसको देखा करता था
वो हुस्न परीशां देख के मैं जिसे ठंडी आहें भरता था
दिन कट जाता था अपना बस तुमको देखा देखी में
क्या दिन थे जब इश्क़ हमारा नैन मटक्का करता था
तेरा देख के मेरी आँखों में अब वो शरमाना नहीं रहा
तुम मेरी पुजारन नहीं रही मैं तेरा दीवाना नहीं रहा

शोखी से लबरेज शरारत दूर से तुम दिखलाती थी
अपने भीगे बाल सुखाने तुम छत पर जब आती थी
मैं तुमको तकता रहता था भूल के सारे जमाने को
मेरे तकने पर तुम भी तो खुद पर ही इतराती थी
एक दूजे को तकने का अब दौर पुराना नहीं रहा
तुम मेरी पुजारन नहीं रही मैं तेरा दीवाना नहीं रहा

मुझसे ही वो प्यार जताना मुझसे ही शरमाना भी
वो तेरा मुझको खूब सताकर मेरे नाज उठाना भी
प्रेम के ढाई अक्षर भी कभी कहा नहीं एक दूजे से
मेरा दिल की धड़कन से तेरा आँखों से कह जाना भी
अब तो यूं खामोशी से वो प्यार जताना नहीं रहा
तुम मेरी पुजारन नहीं रही मैं तेरा दीवाना नहीं रहा

56. कोई जुर्म नहीं क़ातिल का अब
इस इश्क़ ए जुनुं की महफ़िल कोई मोल नहीं है दिल का अब
मक़तूल मोहब्बत करता था कोई जुर्म नहीं क़ातिल का अब

दिल कतरा कतरा बिखरा है और आँख से मोती झरते हैं
तुम लाख क़यामत ढा लो पर हम इश्क़ तुम्ही से करते हैं
तुम चाहो तो हमें मिटा दो हम मरने से कब डरते हैं
कल भी तुम पर मरते थे और आज भी तुम पर मरते हैं
बस इतनी तमन्ना बाकी है कुछ जोर बढ़े संगदिल का अब
मक़तूल मोहब्बत करता था कोई जुर्म नहीं क़ातिल का अब

अब उल्फ़त में मिट जाने को तैयार खड़ा दीवाना भी
शमा की आग में जलने को बेताब बड़ा परवाना भी
राह तुम्हारी रौशन हो तो हमें आता है जल जाना भी
मौत भी दो गर तोहफ़े में तुम है मुमकिन गले लगाना भी
मौत हयात के बीच खड़ा हूँ हल दे दो इस मुश्किल का अब
मक़तूल मोहब्बत करता था कोई जुर्म नहीं क़ातिल का अब

57. मैं कैस तुम्हारा हूँ
तुम मेरे मुकद्दर की पाकीज़ा सी सूरत हो
मैं तेरा सहारा हूँ तुम मेरी जरूरत हो
तुम हया का पैकर हो पलकों को झुकाने पर
बस एक करम कर दो तुम अपने दीवाने पर
तीर ए नजर से तुम मुझको न करो घायल
हिकमत में नहीं इसका इलाज दिखाने पर
दरिया की रवानी तुम मैं तेरा किनारा हूँ
नायाब ज़मीं हो तुम मैं चाँद आवारा हूँ
हम दोनों में है रिश्ता इतना सा फक़त जानां
तुम लाज हो लैला की मैं कैस तुम्हारा हूँ
मैं ढलता सूरज हूँ तुम सांझ सुहानी हो
मैं यार कलम का हूँ तुम मेरी कहानी हो
अलगाव नहीं होगा चाहें भी अगर हम तो
मैं कृष्ण कन्हैया हूँ तुम मीरा दीवानी हो
मैं इश्क का पैकर हूँ तुम प्यार की मूरत हो
मैं तेरा सहारा हूँ तुम मेरी जरूरत हो

58. है शौक बहुत मंहगा हमने जिसे पाला है
कुंदन सा बदन लेकर काँटे वो उगलते हैं
अरमान मेरे दिल का पैरों से कुचलते हैं
है शौक बड़ा उनको बिजली भी गिराने का
हम उनके मुहल्ले से बच बच के निकलते हैं
नाजुक से कलेजे पर हमने उन्हें झेला है
नजरों की कमानों से जो तीर निकलते हैं
वो इश्क़ की राहों में यूं गड्ढे बनाते हैं
हम रोज ही गिरते हैं फिर रोज सम्भलते हैं
वो रोज सितम अपना देते हैं उठाने को
ये बोझ उठाकर भी हम शान से चलते हैं
है शौक बहुत मंहगा हमने जिसे पाला है
हम शौक ए मोहब्बत में दिन रात मचलते हैं

59. यहाँ मुहब्बत में रहजनी है
मरीज ए दिल की दवा है लेकिन असीर ए दिल की दवा नहीं है
न इसकी इतनी करो इबादत ये इश्क़ हरगिज़ खुदा नहीं है
न तुम अकेले हो मयक़दे में न यार तेरा अकेला साक़ी
ये शोख चंचल चपल निगाहें बताओ जग में कहाँ नहीं हैं
न ढूंढो आशिक जनम जनम का तुम्हें न कोई यहाँ मिलेगा
बगैर शर्तों की अब मुहब्बत खतम है बिल्कुल यहाँ नहीं है
है ख्वाहिशें बेपनाह सबकी दिलों में दौलत की चाह सबकी
यहाँ तो उलफत हवस भरी है किसी को शौक ए वफा नहीं है
कहाँ से ढूंढोगे यार दिल का कहाँ से तुमको सुकुं मिलेगा
वो पाक दामन कहाँ है चाहत वो राज़ ए दिल हमनवां नही है
यहाँ मुहब्बत में रहजनी है वो लूट लेंगे कदम कदम पर
नहीं है कोई यहाँ मुहाफिज यहाँ कोई पासबां नहीं है

60. हमारी उल्फ़त की पाक चादर
दिलों की चाहत तुम्हारी हम पर हमारी तुम पर बनी रहेगी
हमारी उल्फ़त की पाक चादर तुम्हारे सर पर तनी रहेगी
सदा हमारा यही करम है तुम्हारे ज़ज्बों का पास रखना
नहीं गवारा हमें है हरगिज़ तुम्हारे दिल को उदास रखना
तुम्हीं से रौशन हमारी दुनिया तुम्ही से दिल का क़रार भी है
तुम्ही से आँगन में शादमानी तुम्ही से घर में निखार भी है
तुम्ही हमारा जहाँ मुकम्मल बिना तुम्हारे मैं हूँ अधूरा
तुम्हारी ख़ातिर सुनो चकोरी सदा रहूँगा मैं चाँद पूरा
तुम्ही हमारी वफा की देवी सुनो हमारा गुमान तुम हो
हमारे बच्चों की नेक अम्मा हमारा सारा जहान तुम हो
तुम्हारी चाहत की चाँदनी को मैं अपने दिल में उतार लूँगा
तुम्हारी संगत में मैं भी अपना फटा मुकद्दर सँवार लूँगा
सुखों का सागर दुखों का दरिया मैं दोनों में ही हूँ साथ तेरे
मैं वो शज़र हूँ कि जिसकी छाया सदा ही तुम पर घनी रहेगी
दिलों की चाहत तुम्हारी हम पर हमारी तुम पर बनी रहेगी
हमारी उल्फ़त की पाक चादर तुम्हारे सर पर तनी रहेगी

61. तुम मुझसे मिलने आ जाना
जब सावन झूला झूले तो
जब पीली सरसों फूले तो
जब कलियाँ भी शरमाएं तो
जब भँवरा गीत सुनाए तो
दो प्यार के बोल सुना जाना
तुम मुझसे मिलने आ जाना

जब सूरज सांझ को ढल जाए
जब जुगुनू घर से निकल जाए
जब रात की रानी महकती हो
जब मस्त चकोरी चहकती हो
तब रुख पर चाँद दिखा जाना
तुम मुझसे मिलने आ जाना

जब मौसम भीगा जाए तो
जब पागल मन मदमाए तो
जब बारिश झूम के आए तो
जब बिजली तुम्हें डराए तो
आगोश में मेरे समा जाना
तुम मुझसे मिलने आ जाना

62. तेरे मुकाबिल खड़ा हूँ मैं
बचपन में हिचकोले खाती वो कागज की नाव दिखा
लोरी गाकर मुझे सुलाती उस ममता की छाँव दिखा
उँगली थाम के चलते थे जो खेतों की पगडंडी पर
वो बाबा के संग चलने वाले नन्हें नन्हें पाँव दिखा
मुझे दिखा वो बाग बगीचे चिड़ियों के संगीत सहित

1. अन्तर्द्वन्द
जब सभ्य समाज में इंसानी विषधर अपना फन फैलाता है
जब राजनीति का छलिया दानव लोगों को छलने आता है
जब अपना भारत बँटा हुआ हो धर्म जाति के टुकड़ों में
जब फँसा हुआ हो अन्न प्रदाता तन मन धन के दुखड़ों में
सीमा रक्षक की विधवा इंसाफ की ख़ातिर भटक रही हो
नारी शील बचाने को जब अपना मस्तक पटक रही हो
जब भूखा बचपन नंगा और बीमार दिखाई पड़ता हो
जब सूरज का तेजस्वी बेटा लाचार दिखाई पड़ता हो

जब सिंहासन की पावन पुतली अपना मोल गँवाती हो
जब प्रतिदिन वीर जवानों की अर्थी सज कर आती हो
जब ये सारा प्रश्न घुमड़ कर मन मस्तिष्क पर छाता है
इन प्रश्नों से मन ही मन लड़ना अन्तर्द्वन्द कहलाता है


2. भारत भाग्य संवारो तुम
जाति धरम का गोरखधंधा रोको इसको बंद करो
आरक्षण का खेल ये गंदा रोको इसको बंद करो
ऊँच नीच का खूनी फंदा रोको इसको बंद करो
राजनीति को मत दो चंदा रोको इसको बंद करो
युवा देश के दूर रहो तुम बहकावे के नारों से
बचे रहो तुम कुंठित कलुषित और संकीर्ण विचारों से
कुर्सी की ख़ातिर मानवता को बेच यहाँ जो आये हैं
दूर रहो उन नेताओं के छिपे हुए हथियारों से
दूर रहे इन सबसे तो क्या होगा तनिक विचारो तुम
कौशल तुममें भरा पड़ा है खुद को जरा निखारो तुम
शिक्षा को हथियार बना लो कलम हाथ में धारो तुम
उठो युवाओं आगे आओ भारत भाग्य संवारो तुम
3. सब मिल कर इनको नमन करो
जो राष्ट्रधर्म पालक थे उनका हम अभिवादन कर लें
इतिहास के पन्ने खोल हम उनको आज नमन कर लें
नमन करें हम आओ तुलसी सूर कबीर की वाणी को
पृथ्वीराज की जन्मदायिनी उस कमला क्षत्राणी को
नमन हमारा वीर शिवा को नमन है जीजाबाई को
स्वामिभक्त कुलदीपक दानी नमन है पन्नाधाय को
नमन हमारा मेवाड़ मुकुट मणि राणा की ललकार को है
जो लड़ते लड़ते टूट गई उस टीपू की तलवार को है
अंग्रेजों से लोहा लेते नमन है हर स्वाभिमानी को
जो खूब लड़ी सन सत्तावन में नमन है झांसी रानी को
जो दो गज का शैदाई था उस बहादुर शाह जफर को है
मरते दम तक आजाद रहा जो नमन उस चंद्रशेखर को है
नमन करो सुखदेव राजगुरू भगत सिंह बलिदानी को
आजादी का मोल बने जो ऐसे हर हिन्दुस्तानी को
नमन हमारा उस विधवा को जिसकी मेंहदी ताज़ी है
नमन हमारा उस ममता को जो बेटा देने पर राजी है
नमन करूँ मैं उस राखी को सीमा पर जिसका भाई है
नई नवेली उस दुल्हन को जिसने माँग सजाई है
नमन हमारा उस बचपन को जो पिता को देख न पाया है
वो पूजे जाने योग्य बुढ़ापा जिसने सर्वस्व गँवाया है
भारत माँ की रक्षा में तत्पर हर जवान नमन स्वीकार करे
भूखा नंगा अन्न प्रदाता हर किसान नमन स्वीकार करे
अपना खून पसीना देने वाले मजदूर नमन के लायक हैं
सब मिल कर इनको नमन करो ये लोकतंत्र के नायक हैं
4. कब तक लहू लजायेगा
कब तक लहू लजायेगा घाटी में जाँबाजों का
फन कब तक कुचला जायेगा ज़ालिम पत्थरबाजों का
कब तक ये सिंदूर लुटेगा क्या दिल्ली बतलायेगी
कब तक राखी अपना रक्षक यूं ही खोती जायेगी
कब तक बचपन रोयेगा पिता की गोद में जाने को
कब तक जननी तरसेगी लाल को अंक लगाने को
सुन लो तुमसे पूछ रही हैं लिपटी लाशें झंडों में
कब तक प्राण गँवायेंगे हम सत्ता के हथकंडों में
जब तक सौदेबाज़ी होगी संसद के गलियारों में
तब तक ठंडी आँच रहेगी लाल तप्त अँगारों में
दुश्मन के हाथों घाटी में जब सैनिक मारा जाता है
सुनी माँग सिसकती है और माँ का दुलारा जाता है
तब साँप सरीखे सत्ताधारी कुछ ऐसा कह जाते हैं
मरने दो जो सैनिक हैं वो मरने को ही आते हैं
सुन लो सत्ताधीशों अपना खेल ये गंदा बँद करो
कूट कपट से बाहर निकलो गोरखधंधा बँद करो
लाल किले का चक्कर छोड़ो लाल चौक भी जाओ तो
वहाँ तिरंगा फहरा कर देश का मान बढ़ाओ तो
एक के बदले दस सिर वाला वादा अपना याद है क्या
जब रोज सिपाही कटता हो फिर भारत जिंदाबाद है क्या
बहुत हुआ अब रहने दो अपनी सारी अय्यारी
सेना को आदेश थमा दो कर ले पूरी तैयारी
गद्दारों से नाता तोड़ो काटो उनकी चालों को
घाटी दे दो पूर्ण रूप से सरहद के रखवालों को
एक बार ये करके देखो हर दुश्मन फँदे में होगा
सेना पर विश्वास करो लाहौर तिरंगे में होगा
5. अब राजधर्म का पालन हो
ये मुल्क हमारा अपना है हम ही इसके संवाहक हैं
जो सर्वधर्म समभाव सिखाती उसी प्रथा के वाहक हैं
इसे बचाना ही होगा अब ज़हर घोलने वालों से
बगल में छुरी रख कर चलते राम बोलने वालों से
इसे बचाना ही होगा अब धर्म के ठेकेदारों से
किस्म किस्म के झण्डों से और उल्टे सीधे नारों से
इसे बचाना ही होगा अब ऊँच नीच के घेरों से
भ्रष्टाचार के दीमक से और नारी लाज लुटेरों से
ध्यान रहे कि देश की गरिमा किसी रूप न खण्डित हो
अब न कोई ढोंगी बाबा देश में महिमामण्डित हो
कह दो सत्ताधीशों से अब राजधर्म का पालन हो
जो कार्य सभी के हित में हों बस उनका ही संचालन हो
6. मैं माटी का पुतला मेरा प्यार माटी
मैं माटी का पुतला मेरा प्यार माटी
मेरी धड़कनों की है रफ्तार माटी

माटी ने मुझको दिया है जनम
खुदा मेरा माटी है माटी सनम
माटी ने बचपन सम्भाला मेरा
था माटी ही पहला निवाला मेरा
हवा में घुलाकर के सौंधी सी खुशबू
करती है मुझको गिरफ़्तार माटी
मैं माटी का पुतला मेरा प्यार माटी
मेरी धड़कनों की है रफ़्तार माटी

वो छुटपन में मिलकर खिलौने बनाना
वो माटी की कीचड़ से होली मनाना
मैं खेला जहाँ वो था माटी का आँगन
मेरे घाव भरती थी माटी की मरहम
खेतों से फसलों की सौगात देकर
करती है अब भी तो सत्कार माटी
मैं माटी का पुतला मेरा प्यार माटी
मेरी धड़कनों की है रफ़्तार माटी

मैं माटी से जुड़कर ही हरदम रहूँगा
माटी को ही अपना हमदम कहूँगा
अज़ल तक है मुझको ये वादा निभाना
हूँ माटी से जन्मा है माटी में जाना
नहीं मुझको कोठी महल की जरूरत
मेरा चार गज का है संसार माटी
मैं माटी का पुतला मेरा प्यार माटी
मेरी धड़कनों की है रफ़्तार माटी
7. टुकड़े टुकड़े पहरों में
कलम उठा कर हाथों में श्रृंगार नहीं लिख पाता हूँ
चूड़ी कंगन पायल की झंकार नहीं लिख पाता हूँ
नदिया चाँद सितारों पर अब गीत नहीं लिख पाता हूँ
कल कल करते झरनों का संगीत नहीं लिख पाता हूँ
बाग बगीचे चिड़िया चुरगुन ये सब कुछ तो भूल गए
सावन भादो कातिक फागुन ये सब कुछ तो भूल गए
नरिया खपड़ा लीपा आँगन ये सब कुछ तो भूल गए
पोखर में अठखेली करता अपना बचपन भूल गए
रोजी रोटी की ख़ातिर हम आ निकले जब शहरों में
अपने वक्त को बाँट दिया तब टुकड़े टुकड़े पहरों में
खुली हवा में सोना भूले बाध की खटिया भूल गई
अब गद्दों पर सोते हैं हम अपने अपने पिंजरों में
हमने बचपन खेल गुजारा खो खो और कबड्डी में
तब जाकर के ताकत पाई अपनी नाजुक हड्डी में
आज का बचपन देखो कैसे कम्प्यूटर से खेल रहा
उसका क्रीड़ाक्षेत्र बना है अब सोफों की गद्दी में
अपने छुटपन की बातें जब बच्चों को बतलाता हूँ
उनकी नन्ही आँखों में बस विस्मय ही तो पाता हूँ
अमराई कैसे दिखलाऊँ नन्हें नन्हें कौतुक को
खेतों बीच नहर का मैं विस्तार नहीं लिख पाता हूँ
कलम उठा कर हाथों में श्रृंगार नहीं लिख पाता हूँ
चूड़ी कंगन पायल की झंकार नहीं लिख पाता हूँ
8. जाने क्या क्या छूटेगा
सब कुछ अपना छूट गया है छूट गई लरिकाई भी
बचपन जिसके साथ गुजारा छूट गया वो भाई भी
माँ का प्यारा आँचल छूटा छूट गई अँगनाइ भी
पोखर ताल तलैय्या छूटे छूट गई अमराई भी
क्या क्या छूटा क्या बतलाऊँ रोजी रोटी पाने में
अपनी सारी दौलत छूटी दो सिक्कों को कमाने में
बहना बिन है सुनी कलाई डाक से राखी आती है
सारे रिश्ते पास हैं लेकिन हम तन्हा हैं ज़माने में
बीवी बच्चों का एक छोटा सा संसार बचा है बस
जब से अपना गाँव है छूटा इतना प्यार बचा है बस
लेकिन ये भी तब तक है जब तक वो शिक्षा पाते हैं
मेरा उनपर पढ़ने तक ही तो अधिकार बचा है बस
कल को वो भी पढ़ लिखकर जब अपने रस्ते जाएंगे
फिर अपना दामन खाली होगा हम तन्हा रह जाएंगे
जाने क्या क्या छूटेगा फिर खुद के विकसित होने में
हम होली ईद दिवाली पर भी शायद ही मिल पाएंगे
9. ऑनलाइन अब शोर बहुत है
देश में भ्रष्टाचार बहुत है
धर्म पे अत्याचार बहुत है
नारी से व्यभिचार बहुत है
लोकतंत्र लाचार बहुत है
माननीय का मान नहीं है
राजनीति का ज्ञान नहीं है
है काला अक्षर भैंस बराबर
तनिक मगर अभिमान नहीं है
नेताओं में चोर बहुत हैं
इनमें जूताखोर बहुत हैं

ये लाज शरम को धो बैठे हैं
बचना ये मुँहजोर बहुत हैं
बस अब जनता जाग चुकी है
कम्प्यूटर पर जोर बहुत है
सबसे बदला ले डालेगी
ऑनलाइन अब शोर बहुत है
10. सबके हों ये काबा काशी
फिर न उजड़ें भारतवासी अब कोई विध्वंस न हो
सबके हों ये काबा काशी अब दंगों का दंश न हो
तनिक हवा अब मत देना नफरत की चिंगारी को
ऊँच नीच का भेद बताते ढोंगी धर्म प्रभारी को
अफवाहों के घोड़ों पर जो सवार हो आती है
पास न अपने आने देना उस कलुषित बीमारी को
मिथ्या रूप बनाते फर्जी धर्म के जो रखवाले हैं
देखो खुद को रंग पोतकर कौवा कोई हंस न हो
फिर न उजड़ें भारतवासी अब कोई विध्वंस न हो
सबके हों ये काबा काशी अब दंगों का दंश न हो
उनसे भी तुम दूर रहो जो सत्ता सुख के पालक हैं
उन्नत भारत परिपथ के वो सबसे बड़े कुचालक हैं
ये रोज फसाद कराते हैं कुर्सी पर क़ाबिज़ रहने को
जीवननाशक उपद्रव रथ के ये नेता ही संचालक हैं
कृष्ण सरीखा ही चुनना तुम राजनीति के रक्षक को
जनमानस हृदय सिंहासन पर देखो कोई कंस न हो
फिर न उजड़ें भारतवासी अब कोई विध्वंस न हो
सबके हों ये काबा काशी अब दंगों का दंश न हो
जाँच कराने लायक अब ये धर्मध्वजा अधिकारी हैं
ठग चोर लुटेरे इनमें भी हैं ये छँटे हुए व्यभिचारी हैं
नेताओं संग ये भी मिलकर देश हमारा लूट रहे
मुल्ला पंडित नेताओं में बहुत से भ्रष्टाचारी हैं
उनको खींच उतारो जो हैं शान से बैठे कुर्सी पर
गाँधी के इस रामराज्य में अब रावण का वंश न हो
फिर न उजड़ें भारतवासी अब कोई विध्वंस न हो
सबके हों ये काबा काशी अब दंगों का दंश न हो
11. कैसी दुनिया हमारी अजब रंग है
कैसी दुनिया हमारी अजब रंग है
सबके जीने का अपना अलग ढंग है
कोई हँस कर जिए कोई रोता हुआ
देखते सब खड़े जुल्म होता हुआ
शर्म आती नहीं अब किसी बात पर
शाद हैं अब सभी अपने हालात पर
जाम पीना तो अब फख्र की बात है
अब तो डिस्को में कटती हसीं रात है
दिल में धोखा लिए सारे फिरते यहाँ
गिरते किरदार से कोई मतलब कहाँ
अब तो जीने का अपना ही अंदाज है
अब फरेबी सभी सब दग़ाबाज़ हैं
सब हैं झूठे यहाँ सब नज़र तंग हैं
कैसी दुनिया हमारी अजब रंग है
12. नयी नसल का फितूर है ये
अजब है दुनिया तुम्हारा मंजर हवस बड़ी है हवास छोटे
गुमां की आँखें हैं वहशीयाना हया के तन पर लिबास छोटे
है महफिलों में घरों की ज़ीनत गुरूर बैठा है ज़ेर ए साकी
वफा की दौलत भी लुट चुकी है नहीं बचा है इमान बाकी
नहीं है बिल्कुल अदा में रौनक बुझा पड़ा है शबाब सारा
यहाँ तो केवल चुभन है बाकी बिखर गया है गुलाब सारा
निगाह मिलने पे वो शरारे कहाँ दिखाती हैं बिजलियां अब
अपने हाथों में जाम लेकर थिरकती फिरती हैं तितलियां अब
किसी के दामन में सच्ची खुशियां बताओ मुझको बची कहाँ हैं
किसी के रुख पे हया की लाली दिखाओ मुझको सजी कहाँ है
नये जमाने भला बताओ असल में किसका कसूर है ये
तुम्हारी संगत का ही असर है नयी नसल का फितूर है ये
13. देखो मैं ही प्रथम प्रतिनिधि
देखो मैं ही प्रथम प्रतिनिधि वीरों की परिपाटी का
मैं ही योद्धा मैं ही साक्षी राणा की हल्दीघाटी का
जिस भूमि ने वीर उगाए टीपू और शिवाजी सम
जहाँ भगत सिंह पनपे थे मैं लाल हूँ ऐसी माटी का
मैं एकलव्य हूँ चढ़ा अँगूठा जिसने द्रोण का मान किया
देखो मैं वही कर्ण हूँ जिसने कवच इंद्र को दान किया
भीष्म प्रतिज्ञा कर ली जिसने संकल्पों का पुतला बन
मैं वही देवव्रत शर शय्या पर जिसने युद्ध विराम किया
राज पाट को तुच्छ समझकर वन में जाता राम हूँ मैं
दुराचार पर अंकुश हूँ और पापों पर पूर्ण विराम हूँ मैं
मैं ही भारत का वो गौरव लिखा गया जो सदियों में
लड़ा गया जो बरसों तक वो आजादी का संग्राम हूँ मैं
14. गरिमा खण्डित होती है
रोज यहाँ मानवता की गरिमा खण्डित होती है
अबला के लाज लुटेरों से बेटी दण्डित होती है
इंसानों की बस्ती में लाज शरम सब खत्म हुए
दौर नया है अब बेशर्मी महिमामंडित होती है
चुन कर जिनको लाते हो जरा देखो कितने लायक हैं
बने वही व्यभिचारी हैं जो आज यहाँ जननायक हैं
जिन्हें गुलाब हम समझे थे वो निकले पेड़ बबूलों के
आज समझ लो ये जन नेता कितने पीड़ादायक हैं
इनकी नजरों में नारी का लेश मात्र सम्मान नहीं
जननी अनुजा बेटी सम रिश्तों का कोई ज्ञान नहीं
चलो उठो संकल्प करो इनको आज बता दें हम
सहन करेंगे हरगिज़ अब वनिता का अपमान नहीं
15. इन्सान हो तुम सीखो
अब झूठ उगलते हैं अख़बार जो होते हैं
बिकते हैं यहाँ पर बद किरदार जो होते हैं
डूबे हैं सरापा जो कीचड़ में गुनाहों की
अब देख लो मजहब के रखवार वो होते हैं
वो रोज मिटाते हैं यहाँ अम्नो अमान देखो
नफरत की हथेली में हथियार जो होते हैं
बनते हैं वही रहबर यहाँ आज जमाने के
मुश्किल से जमाने की बेज़ार जो होते हैं
बचना है तुम्हे इनसे तुम कल के मुहाफ़िज हो
बनो ऐसे गुलिस्ताँ तुम गुलज़ार जो होते हैं
इन्सान हो तुम सीखो जाकर के दरख़्तों से
झुकते हैं वही अक्सर फलदार जो होते हैं
16. जयचंद नहीं हूँ
नफरत तुम्हारे पिंजरे में मैं बंद नहीं हूँ
मखमल में कोई टाट का पैबंद नहीं हूँ
सुनते हैं सभी लोग बहुत प्यार से मुझे
जो केवल तुम्हें सुकून दे मैं वो छंद नहीं हूँ
तुमसा नहीं सरापा मैं मकर ओ फरेब में
मैं शायद इसी लिए तुम्हें पसंद नहीं हूँ
मजहब की आड़ में बोते हो जहर तुम
तुम जैसा मैं इबलीस का फरजंद नहीं हूँ
कुर्सी बचाने के लिए जो गिरती हो गंद में
मैं तुम्हारी उस सियासत का पाबंद नहीं हूँ
काफिर है तु मैं दौलत ए ईमान का धनी
पर माटी से अपने मुल्क की बुलंद नहीं हूँ
मैं शब्दभेदी बाण हूँ महसूस कर मुझे
माँ भारती का लाल हूँ जयचंद नहीं हूँ
17. बुरी है रीत दुनियां की
ज़िनाकारी व मयनोशी में सारे लोग डूबे हैं
बदकारी का आलम है यहाँ मंजर अजूबे हैं
यहाँ चारों तरफ से जुल्म के तूफान उठते हैं
धरम के नाम पर देखो यहाँ शैतान उठते हैं
गुनाहों की तिजारत को यहाँ बाजार लगता है
यहाँ नापाक दौलत का बड़ा अम्बार लगता है
यहाँ की महफिलें तो रक्स से गुलजार होती हैं
मसल कर फेंक देने को यहाँ पर नार होती हैं
मिटा देते हैं बेटी को यहाँ पर कोख में माँ की
है औरत मर्द से कमतर बुरी है रीत दुनियां की
सियासत के खुदा हैं जो वो नफरत के पुजारी हैं
बहुत दौलटत जुटाकर भी वो इज्जत से भिखारी हैं
18. फर्क न होगा अंतिम क्षण में
यहाँ हिंदू मुसलमां दोनों भाई क्या इसको झुठलाओगे
धर्म के नाम पे नफरत को तुम कब तक गले लगाओगे
कब तक बाहर निकलोगे तुम ऊँच नीच के दलदल से
कब समझोगे सब हैं बराबर कब तक मेल मिलाओगे
हैं एक ही मालिक के सब बंदे धर्म है सबका इन्सानी
ये मिटने वाली दुनिया है तुम कब तक ज्ञान ये पाओगे
क्यों छीन रहे हो फ़ानी दौलत एक दूजे से लालच में
अंत सफर पर कहो मुसाफिर तुम क्या संग ले जाओगे
फर्क न होगा अंतिम क्षण में कंधे चार ही मिलने हैं
मुट्ठी बाँध के आए थे तुम हाथ पसारे जाओगे
वक़्त खतम होने पर होगा फिर दोनों का मोल बराबर
या कब्र में जाकर सोओगे या माटी में मिल जाओगे
19. अब तो ऐसा अक्सर होता है
हर शख्स यहाँ बेगाना है हर हाथ में खंजर होता है
अपने शहर की भीड़ का अब वीरान सा मंजर होता है
अपना अपना खोल है सबका घुसे हुए सब उसमें ही
झूठ फ़रेब की दुनिया में अब इन्सां पत्थर होता है
अपने अपने लोभ सभी के सबका अपना मतलब है
इस मतलब की ख़ातिर जग में जंग बराबर होता है
कैसे भला अब बच पाओगे मक्कारी के चंगुल से
अब पाँव तले है पड़ा भरोसा धोखा उपर होता है
खून बहाकर इन्सानों का मजहब हँसता रहता है
नफरत के बाजार में अब तो ऐसा अक्सर होता है
यहाँ लूट जाती है रोज मुहब्बत बेपरवाह ज़माने में
भला कहाँ अब वफा का जज्बा दिल के अंदर होता है
20. मानव के अवतार में आ
देख विधाता पहले जैसा अब तेरा संसार नहीं
तेरी प्रभुता आदम को शायद अब स्वीकार नहीं
मानवता के मानक हरगिज़ उसको अंगीकार नहीं
क्यों पहले जैसा धरती पर लेता तू अवतार नहीं
तेरे बनाए पुतले अब खुद को ही विधाता कहते हैं
तेरी बनाई दुनिया में अब कष्ट प्रदाता रहते हैं
तेरे पुजारी बेच रहे हैं ईमान धरम फुटपाथों पर
तेरा सुमिरन छोड़ के सब शैतान को दाता कहते हैं
अपनी डूबती सृष्टि बचाने माँझी तू मझधार में आ
जिसे बनाया है तुने तू अपने उस संसार में आ
मानवता का मूल्य बचाने आजा तू अविलंब यहाँ
आ तेरी जरूरत है दाता तू मानव के अवतार में आ
21. वहाँ तुम्हारी कलम जगे
तुम कल के भारत हो दरबारों का चारण मत बनना
राजनीति की कुत्सित भाषा का उच्चारण मत बनना
अपना सुख मत लेना हरगिज़ मानवता के मोल कभी
दग्ध हृदय से उठने वाली आहों का कारण मत बनना
तुम बहने वाले सागर हो पर मत बहना जज़्बातों में
तुम खुद को रौशन करते रहना अंधी काली रातों में
पुरूषार्थ तुम्हारा मानव हित में सदा समर्पण भाव से हो
उन्नति पथ पर चलो सिपाही ले राष्ट्र पताका हाथों में
ध्यान रहे अब किसी क्षेत्र में तनिक भी भ्रष्टाचार न हो
जुल्म का कोई रक्षक न हो किसी पे अत्याचार न हो
शस्त्र उठाकर शिक्षा का तुम लाज के रक्षक बन जाओ
ध्यान रहे कि गुड़ियों संग अब कोई व्यभिचार न हो
वहाँ तुम्हारी कलम जगे जब सच्चाई दण्डित होती हो
जब जुर्म की कीचड़ चौराहों पर महिमामंडित होती हो
कलुषित शतरंजी चालों से तुम अपना मुल्क बचा लेना
आवाज उठाना जब सत्ता की गरिमा खण्डित होती हो
22. भ्रष्ट व्यवस्था के शायद हम सब ही कर्ता धर्ता हैं
भ्रष्ट व्यवस्था के शायद हम सब ही कर्ता धर्ता हैं
हम झूठ की पूजा करते हैं सच्चाई के अपहर्ता हैं
कूट कपट हथियार हमारे कुंठित सोच हमारी है
हम भटके हुए विचारों के मनसे पालनकर्ता हैं
स्वार्थ सिद्धि की ख़ातिर गिरना हमको है मंजूर यहाँ
प्रेम पड़ा है कोपभवन में हम नफरत में चूर यहाँ
धर्म जाति का ताना बाना अपने उर में बुनते हैं
है पशुता भरी विचारों में हम मानवता से दूर यहाँ
अंतस का दानव जाग उठा है अच्छाई पर छाने को
हम गर्त में गिरते जाते हैं अपना वर्चस्व दिखाने को
अब दिनचर्या के जैसा है व्यभिचार हमारे जीवन में
पल पल गरिमा जूझ रही है अपनी लाज बचाने को
अब मानस मूल्यों पर जीना हमें शायद है मंजूर नहीं
इंसानी फ़ितरत दिखलाना है अब अपना दस्तूर नहीं
परिणाम बना दुष्कर्मों का है प्रलय हमारे साथ खड़ा
मिट जाए अस्तित्व हमारा वो दिन भी अब दूर नहीं
23. क्या अधिकार हमें है बोलो
जब गर्व बहुत हो अंधियारे के अंतर्मन पर छाने का
क्या अधिकार हमें है बोलो रावण तुम्हें जलाने का

अपराध तुम्हारा जितना था हम रोज ही उतना करते हैं
तुने लक्ष्मण रेखा ना लाँघी हम उसको लाँघा करते हैं
तुम शूर्पणखा की नाक के बदले सीता को हर लाए थे
हम अपनी नाक कटाने को अब रोज ही सीता हरते हैं
शौक बहुत है हमें दशानन दानवता दिखलाने का
क्या अधिकार हमें है बोलो रावण तुम्हें जलाने का

हम अपने मायाजाल में अक्सर नारी को उलझाते हैं
हम अबला को रोज यहाँ बहला फुसला कर लाते हैं
भिक्षुक का रूप बनाना भी हमको कहाँ जरूरी है
हमतो अपनी माया रचकर राम भी बनकर जाते हैं
फ़न आता है देखो हमको अगणित रूप बनाने का
क्या अधिकार हमें है बोलो रावण तुम्हें जलाने का

आज समाज मेंखुलकर देखो घूम रहे हैं अत्याचारी
भरे पड़े हैं जग में राक्षस सुनो दशानन तुमसे भारी
तुम तो दानव होकर भी अपनी गरिमा में बद्ध रहे
सुरक्षित रह गई साथ तुम्हारे लंका में भी जनकदुलारी
कहाँ था तुममें साहस बोलो हम जैसा बन पाने का
क्या अधिकार हमें है बोलो रावण तुम्हें जलाने का

अपने झूठे अहंकार वश तुम अपना सर्वस्व गँवा बैठे
तुम राक्षस कुल के सूरज थे अपना सब तेज बुझा बैठे
आज यहाँ हम हर पल अपने अहंकार में जीते हैं
पाखंड और अन्याय के बल पर हम गद्दी पर आ बैठे
छल अपना हथियार बना है सत्तासुख को पाने का
क्या अधिकार हमें है बोलो रावण तुम्हें जलाने का
24. सेना में भारत बसता है
अपने उर में पाप का तुम और शिकंजा कसते हो
अविश्वास के नागों से तुम मानवता को डंसते हो
धर्म जाति के नाम पे तुम मूर्खों को लड़वाते हो
सेना में भारत बसता है क्यों उस पर प्रश्न उठाते हो

अपनी कुटिल सियासत से लाशों के अंबार लगाये
हिन्दू मुस्लिम करके तुमने जनता के घरबार जलाये
भारत माँ की छाती पर नफ़रत की फसल उगाते हो
सेना में भारत बसता है क्यों उस पर प्रश्न उठाते हो

राजनीति की कुत्सित चालें चलना अब तुम बंद करो
तुम अन्तर्मन में झाँको अपने खुद से अन्तर्द्वन्द करो
तुम खुद पर प्रश्न उठाओ कैसे इतना गिरते जाते हो
सेना में भारत बसता हैक्यों उस पर प्रश्न उठाते हो

सोचो उस दिन क्या होगा जब सब्र की सीमा टूटेगी
कैसे खुद को बचाओगे जब गगरी पाप की फूटेगी
जागेगा जब वीर सिपाही फिर देखो क्या कर पाते हो
सेना में भारत बसता है क्यों उस पर प्रश्न उठाते हो
25. सेना का अभिमान रहे
मत फेंको हर चेहरे पर तुम राजनीति की स्याही को
वक्त अभी है रोक लो खुद पर आने वाली तबाही को
जनता को तो मूर्ख बनाकर टुकड़े टुकड़े बाँट चुके
हिंदू मुस्लिम में मत बाँटो भारत के वीर सिपाही को
है देश की रक्षा में तत्पर वो सीना ताने खड़ा हुआ
सह ठंड धूप पानी पत्थर वो सीमा पर अड़ा हुआ
जाति धर्म और जीना मरना सब कुछ उसका देश ही है
देशभक्ति का जज्बा उसके दिल के अंदर गड़ा हुआ
जिसके कारण रक्षित हो उसको मत उकसाओ तुम
अपने रक्षक को हरगिज़ मत खिलवाड़ बनाओ तुम
तुम जैसे सत्ताधीशों से हैं देश के प्रहरी श्रेष्ठ बहुत
सेना का सम्मान करो मत उसका मान गिराओ तुम
खिलवाड़ बने ना राष्ट्र सुरक्षा इसका तुमको ध्यान रहे
हो सेना पर ना छुद्र सियासत इतना तुमको ज्ञान रहे
गंदी सोच के दलदल में आकंठ डूबा लो तुम खुद को
अस्तित्व तुम्हारा मिट जाए पर सेना का अभिमान रहे
26. सब मील के पत्थर उखड़ गए
राह हमारी मुश्किल है सब मील के पत्थर उखड़ गए
ठंडी छाँव सरीखे जो थे जननायक सब बिछड़ गए
आज के जो जन नेता हैं अब वही प्रगति के बाधक हैं
अब राजनीति की संतानों में भरे बहुत शव साधक हैं
अब रोज यहाँ मानवता की गरिमा का खण्डनहोता है
हर पल अनाचार के दानव का महिमामण्डन होता है
अब लोकतंत्र के गलियारों में पाप की पूजा होती है
गूंगी बहरी इस भ्रष्ट व्यवस्था पर न्याय की देवी रोती है
अब अन्यायी और पापी का होता है सत्कार बहुत
यहाँ झूठ का परचम ऊँचा है सच्चाई है लाचार बहुत
कौन यहाँ है समझने वाला अब जनता की जरूरत को
संसद का मंदिर तरस रहा है एक अखण्डित मूरत को
अब जनसेवा के भाव को भूले देखो सारे खद्दरधारी
अपनी पूंजी बढ़ाने ख़ातिर सत्ता में आते हैं व्यापारी
खूनी चोर उचक्का होना अब कोई अभिशाप नहीं है
व्यभिचार यहाँ अब फैशन है कोई घिनौना पाप नहीं है
नैतिकता आदर्श समर्पण फंस गए सियासी दलदल में
अब लालच के इंसानी गिरगिट रंग बदलते पलपल में
हर एक की नीयत ओछी है और धोखा देना आम यहाँ
सब छल से तरक्की करते हैं अच्छाई है नाकाम यहाँ
अब नफरत की पूजा होती है और मानवता बीमारी है
इन गोरखधंधों में फंसकर भारत की तरक्की हारी है
27. दुःशासन के अवतार बहुत
क्यों खूनी पंजा जकड़ रहा है आज किसी बेचारी को
क्यों मन का राक्षस लूट रहा है अबला की लाचारी को
क्यों पावन धरती की छाती पर नाच रहे व्यभिचारी हैं
क्यों इंसानी पशुओं के हाथों अब शील गंवाती नारी है
क्यों शक्ति स्वरूपा कृष्ण सखी अब भी सतायी जाती है
केश पकड़ कर भरी सभा में खींच के लायी जाती है
क्यों बेटी के निश्छल मन के अरमान उजाड़े जाते हैं
क्यों मानवता की मर्यादा के प्रतिमान उखाड़े जाते हैं
क्यों अन्तर्मन का केशव अब चुपचाप खड़ा रह जाता है
कृष्णा की लाज बचाने मन का माधव आ नहीं पाता है
क्यों ममता शंकित रहती है अब अपनी ही परछाईं से
क्यों राखी को डर लगता है खुद अपनी ही कलाई से
क्यों सभ्य समाज में होता है नारी पर अत्याचार बहुत
घर घर में क्यों पड़े हुए हैं दुःशासन के अवतार बहुत
28. कुछ मोल गंवाने ही होंगे
धृतराष्ट्र आज भी फंसा हुआ है पुत्रमोह के घेरे में
अब भी अन्तर्मन उलझ रहा है कुटिल दाँव के फेरे में
आज भी चौपड़ सजती है और चीरहरण भी होता है
दुर्योधन के दरबारों में लज्जा का क्षरण भी होता है
अनाचार के चक्रव्यूह में कई अभिमन्यु मिट जाते हैं
छल के सघन उपासक अब भी महारथी कहलाते हैं
भीष्म पड़े मजबूर हैं अब भी सिंहासन की रक्षा को
अन्तिम कुरू को ताक रही है कृष्णा अपनी सुरक्षा को
अपमानित करने को पापी उसके वस्त्र को खींच रहा है
द्यूत सभा का सन्नाटा अब भी अनाचार को सींच रहा है
सुमिरन करती है असहाय द्रोपदी चक्र सुदर्शन धारी का
कलियुग में माधव भी नहीं आते सम्मान बचाने नारी का
इस युग में पांचाली को हाथों में हथियार उठाना ही होगा
भरी सभा में दुःशासन को चण्डी रूप दिखाना ही होगा
अब सहन शक्ति संकोच सरीखे कुछ मोल गंवाने ही होंगे
उसे खुद के दाँव लगाए जाने पर खुद प्रश्न उठाने ही होंगे
29. अब राष्ट्रध्वजा फहराने दो
सब धर्मों का भेद मिटाकर एक धर्म इंसानी हो
भारत माँ कीसंतानेंअब केवल हिंदुस्तानी हों
साम्प्रदायिकझगड़ों कारुकना बहुत जरूरी है
मानवता कीलाज बचाना अब अपनी मजबूरी है
पाखण्डी ठेकेदारों का अरमान धरा रह जाने दो
धर्म पताका रखो किनारे राष्ट्रध्वजा फहराने दो

पुतले हो जिस माटी के वो माटी भी संस्कारी है
फिर हर पल क्यों लज्जित होतीलाज हमारी है
जिस भारत में सदियों से ही नारी पूजी जाती है
क्या कारण है आज यहाँ माता की कोख लजाती है
नारी की लाज के चूनर को निष्कलंक लहराने दो
व्यभिचार का झण्डा फेंको और राष्ट्रध्वजा फहराने दो

किस कारण रक्षक के उपर ये पत्थरबाजी चलती है
घाटी में अलगाव की डायन अपना जहर उगलती है
उस फण को क्यों दूध पिलाना जो कुचले जाने लायक है
सेना पर होती नापाक सियासत भारी पीड़ादायक है
कशमीर हमारा अभिन्न अंग है दुनिया को समझाने दो
लाल चौक की छाती पर भी अब राष्ट्रध्वजा फहराने दो
30. उनके जीवन का सुख राम के पास हो
हँस के जीवन जियें कामिनी कंचना
निरादर न हो उनका हरगिज़ यहाँ
पूरी उनके हृदय की सभी आस हो
उनको पुरुषों से रक्षा का विश्वास हो
ना मिले कोई रावण उन्हें अब यहाँ
उनके जीवन का सुख राम के पास हो
ना लगे दाँव पर अब कोई द्रोपदी
जीते शकुनि न अब वेदना लाज की
खींच ले चीर नारी के तन से कोई
ऐसी ज़ुर्रत न हो अब किसी राज की
अब किसी राधिका को उदासी न हो
अब कोई सुंदरी देवदासी न हो
रोक लो अपनी कुत्सित प्रवृति मनुज
अब कोई नन्दिनी फिर रुआँसी न हो
अब भय मुक्त होकर रहे आत्मजा
निरादर न हो उनका हरगिज़ यहाँ
31. बस एक जटायु के जैसा
क्यों भारत गौरव गाथा को खण्डित करते जाते हो
निरपराध क्यों अबला को दण्डित करते जाते हो
कोई एक भूभाग बता दो जहाँ सुरक्षित नारी है
गली गली चौराहे पर घर घर में व्यभिचारी हैं
कुचले जाने पर भी क्यों दोष है सारा औरत का
क्या पाठ पढ़ाया है तुमने कभी बेटों को भी गैरत का
जब भरी सभा में लाज लुटी तो काष्ठ बने क्यों बैठे थे
पुत्र मोह से बँधे हुए धृतराष्ट्र बने क्यों बैठे थे
सिंहासन स्वमूल अर्थ में जो सिंहों का आसन है
हाय यहाँ दुर्भाग्य हमारा अब गिद्धों का शासन है
गिद्ध भी उसको कैसे कह दें जो गिद्ध से नीच ही जीता हो
गिद्ध प्राण न्योछावर कर बैठा था जब चला बचाने सीता को
बस एक जटायु के जैसा हम सिखला पाते संतानों को
तो हर बेटी निर्भय हो जी लेती अपने सब अरमानों को
32. यहाँ बेईमानी दुष्कर्म नहीं
ये राजनीति की बस्ती है
यहाँ मानवता भी सस्ती है
है झूठ का काला राज यहाँ
सच्चाई पड़ी सिसकती है
सब उल्टे सीधे काम यहाँ
हैं लोग बहुत बदनाम यहाँ
जो जितना भारी लुच्चा है
है उसका उतना नाम यहाँ
अब ज़ुल्मी खद्दर वाले हैं
तन उजला है मन काले हैं
तुम अपनी आन बचा लेना
ये सब कुछ लूटने वाले हैं
जो जन नेता कहलाते हैं
कुछ ऐसी आग लगाते हैं
अपना मतलब साधने को
हमें आपस में लड़वाते हैं
यहाँ इनका कोई धर्म नहीं
इनमें थोड़ी भी शर्म नहीं
येमुल्क लुटे तो लुट जाए
यहाँ बेईमानी दुष्कर्म नहीं
33. बस इसको अविरल रहने दो
पतित पावनी गंगा अब वो निर्मल धार गवां बैठी
वो पाप मिटाना भूल गई अब मैला धोने आ बैठी
इसको पूजने वालों का ही दोष यहाँ पर सारा है
उनके कारण ही तो दूषित भागिरथी की धारा है
हम जो इसकी धारा में पूजा के पुष्प बहाते हैं
वही फूल सड़ गल कर फिर कचरा बन जाते हैं
फेंक रहे हैं खुद का कचरा देखो इसके किनारों पर
कोई अंकुश नहीं हमारा मलमोरी की धारों पर
देखो ये अपशिष्ट हमारा इसको मैला करता है
उद्योग जगत का कचरा भी इसमें ही तो बहता है
गंगा की बाधाएँ काटो कलकल इसको बहने दो
निर्मल खुद हो जाएगी बस इसको अविरल रहने दो
34. ये फिर तुमको फुसला लेंगे
ये खद्दर वाले मदारी हैं सब अपना खेल दिखा देंगे
लूट के सारा भाईचारा तुम्हें आपस में लड़वा देंगे
बच के रहना तुम इनसे ये बाजीगर हैं बहुत बड़े
ये धर्म का पासा फेंकेंगे और दंगे भी करवा देंगे
तुम अपने खून पसीने से दो जून की रोटी खाते हो
बस इनको कुर्सी मिलने दो ये भुखमरी तक ला देंगे
सब अत्याचारी दानव ही अब कुर्सी पर आ बैठे हैं
अपने स्वार्थ की ख़ातिर तुमको सूली पर लटका देंगे
तुम भूख गरीबी बेकारी की इनसे चर्चा मत करना
वरना ये सब कट्टर बनकर मंदिर मस्जिद ला देंगे
पाँच बरस तक नहीं किया कुछ मुँह सुजाए बैठे हो
बस आम चुनावों से पहले ये फिर तुमको फुसला लेंगे
35. खेल तुम्हारा ठीक नहीं
बचपन के आंगन में इठलाती किलकारी से मत खेलो
युवा भविष्य को आँख दिखाती बेकारी से मत खेलो
किसी अबला के रोते आँचल की लाचारी से मत खेलो
तुम जनमानस के उर में बसी हुई चिंगारी से मत खेलो
मत खेलो धर्म का खेल यहाँ किसी सच्चे भारतवासी से
मत खेलो दीन किसानों की आँखों में बसी उदासी से
सीमा रक्षा की ख़ातिर जो आठ प्रहर है अडिग खड़ा
सर्वस्व त्याग कर आया है जो मत खेलो उस सन्यासी से
मजलूमों और लाचारों से ये खेल तुम्हारा ठीक नहीं
जाति धरम के हथियारों से ये मेल तुम्हारा ठीक नहीं
अब खेल तुम्हारा ठीक नहीं है जनता के जज्बातों से
ऊँच नीच के अंगारों से ये खेल तुम्हारा ठीक नहीं
36. पत्थर का बदला गोली हो
दशकों से बारूद घुला है काशमीर की माटी में
अलगावी विषबेल पनपती है बर्फीली घाटी में
तंग सियासत दूर खड़ी मुस्काती है मक्कारी से
सेना प्रतिक्षण जूझ रही है बंधन की लाचारी से
संगीनें खामोश पड़ी हैं तन पर पत्थर खा कर भी
दहशत छुट्टा घूम रही है घाटी में आग लगा कर भी
काली आँधी नफरत की क्यों मानवता से खेल रही
अलगाववाद का दंश भला क्यों सरकारें झेल रहीं
सत्ता ही मौका देती है आँगन में मातम पुर्सी का
आतंकवाद से बढ़कर है खेल ये शायद कुर्सी का
बहुत सहा अब घाटी के गद्दारों को सबक सिखाना है
मुकुट रूप कश्मीर को अब काँटों से मुक्त कराना है
अब सेना को बंधनमुक्त करे ये सत्ता की मजबूरी है
पत्थर का बदला गोली हो घाटी में बहुत जरूरी है
37. अब गोविंद न आएंगे
बहुत बनी तुम लक्ष्मी जैसी अब दुर्गा का रूप धरो
अपने हर अपराधी का तुम उठकर खुद संहार करो
तुम काली चंडी बन कर के तांडव अपरम्पारकरो
पाप नाशिनी बनो भवानी कुछ ऐसा श्रृंगार करो
शस्त्र उठाकर टूट पड़ो अपना सम्मान बचाने को
अब गोविंद न आएंगे तुम्हरी लाज बचाने को
चक्र सुदर्शन खुद ही धारो दुष्टों का संहार करो
खड्ग संभालो हाथों में व्यभिचारी पर वार करो
जो हृदय कँपा दे दानव का तुम ऐसी हुंकार भरो
उठो भवानी दुर्गा बनकर पाप का तुम प्रतिकार करो
चंडी बनकर खड़ी रहो तुम खुद पर आँच न आने दो
अब गोविंद न आएंगे तुम्हरी लाज बचाने को
बहुत सह लिया अत्याचार अब उठकर ललकार भरो
फूलन को आदर्श बना लो हाथों में हथियार धरो
दुःशाशन की बाँह उखाड़ो उसपर कठिन प्रहार करो
खुद ही अपनी नाव संभालो खुद का बेड़ा पार करो
खुद ही खुद को सज्य करो तुम अपना मान बढ़ाने को
अब गोविंद न आएंगे तुम्हरी लाज बचाने को
38. तुम्हें लड़ने का अधिकार नहीं
खुद आप हैं बैठे महलों में माता घुमे सड़कों पर
जो माँ का दूध लजाते हैं धिक्कार ऐसे लड़कों पर
गौ सेवा के नाम पे जो आडम्बर फैलाते हैं
खुद उनके ही आँगन से गोवंश निकाले जाते हैं
सड़कों पर वो झुण्ड बनाकर दुर्घटना के कारक हैं
कूड़ा कचरा खाकर वो खुद अपने ही संहारक हैं
आपस में ही लड़ते हैं जनता को दुख पहुँचाते हैं
कभी किसी वाहन से लड़कर अपने पाँव तुड़ाते हैं
आवाज़ लगाता हूँ उनको जो काट रहे इंसानों को
गोरक्षा का संकल्प लिए गऊ माता की संतानों को
मात्र एक गोवंश को तुम अपनाकर जरा दिखाओ तो
बस छुट्टा घूम रहा इक बछड़ा अपने घर ले जाओ तो
कर न सके जो ऐसा तो तुम मानो कि अतिवादी हो
गो हत्या के पाप के तुम भी उतने ही अपराधी हो
गोवंश खुला क्यों छोड़ते हो क्या गौमाता से प्यार नहीं
जब तक जुर्म ये करते हो तुम्हें लड़ने का अधिकार नहीं
39. सच्चा धर्म वही होता है
बरसों से हम झेल रहे हैं मज़हब की परिपाटी को
पल पल दूषित करते हैं हम भारत माँ की माटी को
धर्म के नाम पे कट्टरता के विषबेल उगाए जाते हैं
क्यों ईष्ट हमारे अंतस के सड़कों पर लाए जाते हैं
जाति धर्म हथियार बना है पाखंडी ठेकेदारों का
मांस नोंचने झुण्ड खड़ा है खादी में रंगे सियारों का
अब मंदिर मस्जिद गुरुद्वारों का भेद मिटे मजबूरी है
उन्नत भारत के हित में बस राष्ट्रधर्म ही जरूरी है
धर्म हमारी निजता है जो हृदय में धरने लायक है
चौराहों पर मजहब लाना कुंठा का परिचायक है
सत्ता लोलुप तंग सियासत आज बनी हत्यारी है
बस्ती बस्ती आग लगाती मजहब की चिंगारी है
इस चिंगारी को भड़काना सत्कर्म नहीं हो सकता है
जो नफरत फैलाता हो वो धर्म नहीं हो सकता है
जो प्रगति पथ पर ठोकर ना हो धर्म वही कहलाता है
सच्चा धर्म वही होता है जो अन्तर्मन सहलाता है
40. देश हमारा लूट लियो
थोड़ा सा छल थोड़ी नफरत थोड़ी सी मक्कारी लो
ठग विद्या का ज्ञान लो थोड़ा थोड़ी सी अय्यारी लो
झूठे वादों का गट्ठर लो जनता को मूर्ख बनाने को
थोड़ी सी चतुराई लो फिर उसमें अवगुण भारी लो
एक साथ सब खल में डालो ठीक सबको कूट लियो
अब सारा मिश्रण भेजे में रख देश हमारा लूट लियो

बेशर्मी की सारी किस्में खोज खाजकर ले आना
भ्रष्टाचार की गठरी संग तुम घूस माँगकर ले आना
जनता से लो खून पसीना गाय भैंस से चारा लो
बेईमानी का काला मोती खूब छानकर ले आना
इन सब का एक घोल बनाकर छोटा छोटा घूंट पियो
नशा चढ़ाकर ताकत का तुम देश हमारा लूट लियो

नेता बनने की ख़ातिर तुम बस इतना सा कष्ट करो
कालाधन को गले लगाकर रंगभेद को नष्ट करो
जाति धर्म का जहर लो थोड़ा थोड़ी सी गद्दारी लो
पोत के अपने मुँह पर कालिख तुम खादी को भ्रष्ट करो
जो विरोध में कुछ भी बोले उनको जमकर कूट लियो
झार के खद्दर अपने तन पर देश हमारा लूट लियो
41. अब आज का भारत ऐसा है
मानव पहले ही सच्चा था
वो आदि युगीन ही अच्छा था
जब जात पात कुछ बने न थे
जब धर्म के झंडे तने न थे
जब ऊँच नीच का ज्ञान न था
जब ताकत पर अभिमान न था
जब सत्ता मद में चूर न था
छल करने को मजबूर न था
फिर थोड़ी बुद्धि प्रखर हुई
और छलिनी माया मुखर हुई
कुछ लोग बढ़े अगुआई में
गिर गए धर्म की खाई में
अब अंधा एक व्यापार चला
डर का कारोबार चला
समता के वृक्ष को काट दिया
सबको वर्णों में बाँट दिया
खेल ये गंदा चल निकला
धर्म का धंधा चल निकला
फिर कालचक्र कुछ और चला
अब राजतंत्र का दौर चला
राजा को अभिमान हुआ
खुद में ईश्वर का भान हुआ
स्वयं को सब कुछ जान लिया
जनता को सेवक मान लिया
वो घमंड में अपने यों ऐंठा
कि राज्य के टुकड़े कर बैठा
अपना अभिमान बढ़ाने को
भाई को धूल चटाने को
जा मिला वो बाहरवालों से
लड़ बैठा खुद घरवालों से
फिर जुर्म बड़ा संगीन हुआ
अपना भारत आधीन हुआ
अभिमान गया सम्मान गया
फिर सत्ता का सोपान गया
जब जुल्मो सितम से चूर हुए
तब हम लड़ने को मजबूर हुए
मरने का संकल्प उठा बैठे
हम लाखों शीश गवां बैठे
जब बहुत लड़े आजादी ली
और बँटवारे की बर्बादी ली
फिर मुश्किल से हम खड़े हुए
कब तक रहते यूं पड़े हुए
सब भूल भाल कर दिल का छाला
उठकर हमने देश संभाला
रजवाड़ों से राज लिया
तब लोकतंत्र को जन्म दिया
जब लोगों की सरकार बनी
कुछ उन्नति की रफ़्तार बनी
फिर लालच ने वो कर्म किया
राजनीति को जन्म दिया
इसको मारो उसको काटो
जाति धर्म में सबको बाँटो
स्वार्थ सिद्धि मेंअंधे होकर
कूट कपट में गंदे होकर
मानवता से व्यभिचार किया
हमने खुलकर भ्रष्टाचार किया
यहाँ शहर भी जंगल जैसा है
अब आज का भारत ऐसा है
42. उनका शोषण होता है
सर्वाधिक अपमान वहीं जहाँ कन्या पूजन होता है
सीता राधा की धरती पर उनका शोषण होता है

पर निंदा के कारण वो वनवास को भेजी जाती है
हर पल उसके जीवन में इक अग्नि परीक्षा आती है
भरी सभा में बालों से वो खींच के लायी जाती है
यहाँ द्यूत में खुद की भार्या दाँव लगाई जाती है
अपनों के कारण नारी का अपमान प्रतिक्षण होता है
सीता राधा की धरती पर उनका शोषण होता है

सारे नाते तोड़ चली जो अपना संसार बसाने को
बाबुल का घर छोड़ दिया अपना घर बार बनाने को
रोकर जिसने पीहर छोड़ा अपना ससुराल हँसाने को
सात जनम की कसम उठाकर आ गई साथ निभाने को
दहेज की ख़ातिर उसपर भी जुल्म यहाँ पर होता है
सीता राधा की धरती पर उनका शोषण होता है

युगों युगों से दलित रही है नारी आज भी वैसी है
आदिम युग में जैसी थी अब भी बिल्कुल वैसी है
पढ़ी लिखी ये दुनियां देखे उसकी हालत कैसी है
आज भी कुचली जाती है वो पाँव की जूती जैसी है
अबला से व्यभिचार आज कल देखो क्षण क्षण होता है
सीता राधा की धरती पर उनका शोषण होता है
43. फिर अपना झण्डा गड़ा रहेगा
क्यों फूलों की घाटी में अलगाव की सोच प्रभावी है
राष्ट्र ध्वजा के उपर काहे राज्य का झण्डा हावी है
क्यों देशद्रोह की कालिख माथे पर सज्जित होती है
क्यों गरिमा पहरेदारों की पत्थर से लज्जित होती है
भारत से भाव पृथकता का क्यों घाटी में संचित है
पावन छाया से तीन रंगों की लालचौक क्यों वंचित है
क्यों झीलों के अन्तर से जहरीला नीर निकलता है
बर्फीली चट्टानों के भीतर क्यों बारूद उबलता है
क्यों पुष्पों का श्रृंगार यहाँ पर बन्दूकों ने नष्ट किया
धरती की जन्नत का गौरव आतंकवाद ने भ्रष्ट किया
क्यों नफ़रत के जहरीले बिच्छू यहाँ अमन से खेल रहे
काले नागों का दंश भला हम क्यों दशकों से झेल रहे
बात चीत पर आधारित अब समझौते के हालात नहीं
कशमीर समस्या सुलझाना सत्ता के बस की बात नहीं
बस सेना को अधिकार मिले अब पूर्ण रूप से घाटी का
फिर नहीं बचेगा एक भी दुश्मन भारत माँ की माटी का
हर मैदान शिखर चौराहे पर फिर अपना झण्डा गड़ा रहेगा
आतंक का आका शीश नवाए कदमों के नीचे पड़ा रहेगा
44. याद वही रह जाएगा
मुट्ठी बाँध के आने वाले तुम हाथ पसारे जाओगे
अन्त सफर पर लोगों के काँधों के सहारे जाओगे
कोठी बंगले मोटर गाड़ी काम नहीं कुछ आना है
महंगे वस्त्राभूषण को भी यहीं त्याग कर जाना है
सुख सुविधा की सारी चीजें जग में आनी जानी है
गर्व है जिसकी ताकत पर वो देह नष्ट हो जानी है
धन दौलत और नाता रिश्ता यहीं धरा रह जाएगा
चल दोगे तुम निपट अकेले जब भी काल बुलाएगा
अंत समय में साथ न होगा कुत्सित हेरा फेरी का
उस दिन कोई मोल न होगा धन दौलत की ढेरी का
जीवन संगी सखा सहोदर किसको साथ में जाना है
अंत क्रिया के बाद सभी को मुड़कर पीठ दिखाना है
ले जाओगे इस दुनिया से दो ही चीजें साथ में तुम
पाप पुण्य की एक एक गठरी पाओगे सौगात में तुम
उस क्षण में छल छद्म तुम्हारा कोई काम न आएगा
प्रारब्ध तुम्हारा कैसा हो ये गठरी का भार बताएगा
अपने ऊँचे कुल का झूठा ये अभिमान जताना क्या
अपनी सुंदर काया पर खुद मोहित हो इतराना क्या
इस ऊँचे कुल का दर्प तुम्हारा ये संसार भुला देगा
वक्त का थप्पड़ बलिष्ठ देह का सब श्रृंगार मिटा देगा
सब कुछ माटी हो जाएगा माटी में मिल जाने पर
सत्कर्म तुम्हारे अमर रहेंगे दुनियां छोड़ के जाने पर
सांसों की डोरी टूटेगी तो कुछ साथ नहीं रह पाएगा
जो अच्छे कर्मों का फल होगा याद वही रह जाएगा
45. सुनो राधिका अब कन्हैया नहीं हैं
सुनो राधिका अब कन्हैया नहीं हैं
मधुर बाँसुरी के बजैया नहीं हैं
नहीं राधा रानी है ग्वालों की टोली
कदम डाल पर है न चिड़ियों की बोली
तुमको न अब प्यारी सखियाँ मिलेंगी
करोगी बताओ तो किससे ठिठोली
वो जमुना के तीरे कदम भी नहीं हैं
हरी घास चरती वो गइया नहीं हैं
सुनो राधिका अब कन्हैया नहीं हैं
मधुर बाँसुरी के बजैया नहीं हैं
वृन्दावन में मचाया था जिसने कोलाहल
जमुना में घोला था अपना हलाहल
जो विषधर था पहले रमण द्वीप वासी
बिखेरे हुए था चतुर्दिक उदासी
महानाग के फन को कुचला था जिसने
गरल राज के वो नथैया नहीं हैं
सुनो राधिका अब कन्हैया नहीं हैं
मधुर बाँसुरी के बजैया नहीं हैं
सर्वपापहारी यहाँ पर नहीं हैं
वो बाँके बिहारी यहाँ पर नहीं हैं
कुछ भी नहीं है तुम्हारे समय का
कलियुग है राधे ये द्वापर नहीं है
नन्द बाबा यशोदा की आँखों के तारे
बलभद्र के प्यारे भईया नहीं हैं
सुनो राधिका अब कन्हैया नहीं हैं
मधुर बाँसुरी के बजैया नहीं हैं
46. अपना हिंदुस्तान लिखो
लोकतंत्र ने बागडोर दी चोरों और डकैतों को
भारत माँ को सौंप दिया आदमखोर लठैतों को
लोकतन्त्र का लड्डू सबने आधा आधा बाँट लिया
सभी दीमकों ने मिल कर के मुल्क हमारा चाट लिया
अब तो पैमानों में अपने वो खून मिलाकर पीते हैं
गाय भैंस का दूध नहीं अब चारा खाकर जीते हैं
इनका कोई दोष नहीं है अपनी गलती सारी है
हम चुन कर इनको लाते हैं बस ये भूल हमारी है
सोचो लेकिन क्या कर लेंगे हम भी हैं लाचार बहुत
बदतर से बद चुनना है हमको भी दुश्वार बहुत
हमने बरसों बहुत सहा अब रोकें इनके नर्तन को
सब मिल कर आवाज़ उठाएं संविधान परिवर्तन को
लोकतंत्र के आसन का अब ऐसा अधिकारी हो
जिसपर कोई दाग न हो बस वो ही सत्ताधारी हो
तय कर लो सिंहासन पर व्यभिचारी का अधिकार न हो
दामन जिसका दागी हो वो नामांकन स्वीकार न हो
अनपढ़ एक न आगे आएं पढ़े लिखों पर शासन को
कोई शिक्षित ही ले आओ सचिवालय से संभाषण को
मुल्क तरक्की कर जाए ऐसा एक विधान लिखो
विकसित स्वछ सुरक्षित अपना हिंदुस्तान लिखो
47. समुचित मोल चुकाया जाए
आजादी के बाद मुल्क ने सत्तर बरस गुजारा है
पर किसान के आँगन में आज भी वो अँधियारा है
खेतों में अन्न उगाने को जो दिन रात झुलसता है
एक जून की रोटी को हलधर का लाल हुलसता है
अब भी उसको खेती में कर्जा ही लेना पड़ता है
फिर उसी महाजन कोठी को सब वापस देना पड़ता है
कठिन परिश्रम बाद भी जब ना कर्ज चुकाया जाता है
तब भोर की धुंधली बेला में फंदे पर पाया जाता है
आज ज़रूरत है देश में ऐसा एक विधान बने
कर्ज समस्या ना बन पाए इसका एक निदान बने
समुचित मोल चुकाया जाए भारत अन्न विधाता को
समय से बिजली पानी हो तब सम्पन्न किसान बने
48. उससे बढ़कर कौन भला है
मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे और गिरजाघर पूजे जाते हैं
आग हवा पानी मिट्टी और पत्थर पूजे जाते हैं
सबकी अपनी पद्धतियां हैं पूजन और नमाजों की
अपने अपने ईष्ट सभी के घर घर पूजे जाते हैं
आज मगर कुछ ऐसा कर लें छोड़ के पूजन विधियों को
सब से ऊपर ले आएं अब राष्ट्र की संचित निधियों को
धर्म ध्वजा अब छत पर टाँगें हाथ सभी के तिरंगा हो
सब मिल कर संकल्प उठा लें निर्मल जमुना गंगा हो
प्रथम पूज्य हो वीर सिपाही जो सीमा पर अड़ा हुआ
जलकर रेगिस्तानों में और बर्फ में जमकर खड़ा हुआ
जो प्राण न्योछावर कर देता है सबका संसार बचाने को
उससे बढ़कर कौन भला है सबमें पूजे जाने को
49. अपना कोई मोल नहीं
सांसों के जारी रहने तक तो फर्ज निभाना होता है
जो कुछ पाते हैं जीवन से वो कर्ज चुकाना होता है
बच्चों की फ़रमाइश भी तो अपनी जिम्मेदारी है
जब रूठ रहा हो जिद्दी बचपन उसे मनाना होता है
सब नाज़ उठाने पड़ते हैं उस नाजु़क नखरेवाली के
उसकी मीठी धुनपर हमको साज़ बजाना होता है
सबकी चाहत पूरी हो बस इतना सा अरमान यहाँ
इस चाहत के घेरे में बस अपना ताना बाना होता है
है जीवन अपना कैद यहाँ पर रिश्तों की जंजीरों में
जग में हमको इन रिश्तों का साथ निभाना होता है
मिटने वाली इस दुनिया में अपना कोई मोल नहीं
यहाँ अपनी अपनी बारी पर सबको जाना होता है
50. तेरे इश्क में वफा की ऐसी मिसाल दूँ मैं
खुशियां जमाने भर की झोली में डाल दूँ मैं
तेरी सारी मुश्किलों को हँसकर संभाल दूँ मैं
नाजुक से पाँव में गर चुभ जाए कोई काँटा
तो आ बैठ पास मेरे उसको निकाल दूँ मैं
आँखों में बेबसी के कभी आएं न तेरी आँसू
मुस्कान इन लबों पर आ बेमिसाल दूँ मैं
अरमान तेरे दिल का हर हाल में हो पूरा
आ सारे ख्वाब तेरे हकीकत में ढाल दूँ मैं
बरसों में जो बना है तिनके बटोर कर के
चाहत का वो घरौंदा आजा कमाल दूँ मैं
मैं साँसों के डूबने तक बस तेरा ही रहूंगा
तेरे इश्क में वफा की ऐसी मिसाल दूँ मैं
51. हम किसके क्या क्या होते थे
खुश होता था अपना मन कागज़ की नाव चला कर के
जब सारा खजाना मिल जाता था गुल्ली डंडा पा कर के
मन भरता था कहाँ भला तब चोर सिपाही खेल के भी
हम पानी संग अठखेली करते पोखर ताल में जा कर के
दादा दादी के हम प्यारे उनकी आँख का नूर थे हम
बचपन कितना प्यारा था जब दायित्वों से दूर थे हम
क्या बतलाएं छुटपन में हम किसके क्या क्या होते थे
अम्मा के थे किसन कन्हैया बाबा के मयूर थे हम
अब फूस का छप्पर पड़ी मड़ईया कच्चा आँगन नहीं रहा
अब थाली में चंदा दिखलाता जल का दर्पण नहीं रहा
अब नहीं रहे वो खेल खिलौने रौनक मस्ती नहीं रही
अब छूट गए सब संगी साथी प्यारा बचपन नहीं रहा
52. मुझे आदमी का ख़िताब दे
तेरी रहमतों को पढ़ा करूँ मुझे कोई ऐसी किताब दे
मुझे अपना बंदा कुबुल कर मेरी हसरतों का जवाब दे
मेरी चार पल की है ज़िन्दगी यहाँ बेशुमार हैं गलतियां
मेरी ख़ामियों को जो ढक सके मुझे एक ऐसा नकाब दे
तारीकियां हैं यहाँ बहुत इन्हें दूर कर मुश्किलकुशां
मुझे रौशनी का शज़र न दे बस एक नन्हा चिराग दे
मेरा मुल्क सारा सुलग रहा है नफरतों के अज़ाब में
अमन की दौलत मेरे खुदा मेरे मुल्क को बेहिसाब दे
रहूँ मुसल्लम मैं दीन पर तौफ़ीक़ मुझको तु कर अता
मेरे पाक दिल की है आरजू मुझे आदमी का ख़िताब दे
53. मुझको तुम मजदूर रख लो
प्यार से इक बार देखो ये जहाँ रुक जाएगा
नाच उठेगी जमीं और आसमां झुक जाएगा
ना गिराओ इस कदर आँखों से अपनी बर्क़ भी
इस समंदर का कलेजा आँच से फूँक जाएगा
ऐ हसीना बाज़ आओ जुल्म अपना रोक लो
वरना ये आशिक़ बेचारा जान से चुक जाएगा
ये अदाएँ ये जफ़ाएँ हुस्न ओ जवानी ये सितम
मुझको तुम मजदूर रख लो बोझ ये उठ जाएगा
54. तुमसे बेहतर कौन करे है
नैन मिलाकर नैन चुराना तुमसे बेहतर कौन करे है
नैनों से ही सब कह जाना तुमसे बेहतर कौन करे है
अपने दिल की सब बातें तुम कह देती हो इशारों में
चुप रह कर भी प्यार जताना तुमसे बेहतर कौन करे है
जुल्फ झटककर हौले से वो ढक लेना रुखसारों को
बदली में यूं चाँद छिपाना तुमसे बेहतर कौन करे है
लम्हा लम्हा धड़कन में तुम मेरी उतरती जाती हो
चुपके से यूँ दिल में समाना तुमसे बेहतर कौन करे है
अब जाम पिला दो आँखों से हम मदहोशी में डूबें तो
नजरों से यूँ जाम पिलाना तुमसे बेहतर कौन करे है
हया के भार से झुकी हैं पलकें गाल गुलाबी शर्मीले
आहिस्ते से यूँ शरमाना तुमसे बेहतर कौन करे है
55. मैं तेरा दीवाना नहीं रहा
इश्क़ की रौनक नहीं रही उल्फ़त का जमाना नहीं रहा
तुम मेरी पुजारन नहीं रही मैं तेरा दीवाना नहीं रहा

वो चाँद सा मुखड़ा खिड़की में मैं जिसको देखा करता था
वो हुस्न परीशां देख के मैं जिसे ठंडी आहें भरता था
दिन कट जाता था अपना बस तुमको देखा देखी में
क्या दिन थे जब इश्क़ हमारा नैन मटक्का करता था
तेरा देख के मेरी आँखों में अब वो शरमाना नहीं रहा
तुम मेरी पुजारन नहीं रही मैं तेरा दीवाना नहीं रहा

शोखी से लबरेज शरारत दूर से तुम दिखलाती थी
अपने भीगे बाल सुखाने तुम छत पर जब आती थी
मैं तुमको तकता रहता था भूल के सारे जमाने को
मेरे तकने पर तुम भी तो खुद पर ही इतराती थी
एक दूजे को तकने का अब दौर पुराना नहीं रहा
तुम मेरी पुजारन नहीं रही मैं तेरा दीवाना नहीं रहा

मुझसे ही वो प्यार जताना मुझसे ही शरमाना भी
वो तेरा मुझको खूब सताकर मेरे नाज उठाना भी
प्रेम के ढाई अक्षर भी कभी कहा नहीं एक दूजे से
मेरा दिल की धड़कन से तेरा आँखों से कह जाना भी
अब तो यूं खामोशी से वो प्यार जताना नहीं रहा
तुम मेरी पुजारन नहीं रही मैं तेरा दीवाना नहीं रहा
56. कोई जुर्म नहीं क़ातिल का अब
इस इश्क़ ए जुनुं की महफ़िल कोई मोल नहीं है दिल का अब
मक़तूल मोहब्बत करता था कोई जुर्म नहीं क़ातिल का अब

दिल कतरा कतरा बिखरा है और आँख से मोती झरते हैं
तुम लाख क़यामत ढा लो पर हम इश्क़ तुम्ही से करते हैं
तुम चाहो तो हमें मिटा दो हम मरने से कब डरते हैं
कल भी तुम पर मरते थे और आज भी तुम पर मरते हैं
बस इतनी तमन्ना बाकी है कुछ जोर बढ़े संगदिल का अब
मक़तूल मोहब्बत करता था कोई जुर्म नहीं क़ातिल का अब

अब उल्फ़त में मिट जाने को तैयार खड़ा दीवाना भी
शमा की आग में जलने को बेताब बड़ा परवाना भी
राह तुम्हारी रौशन हो तो हमें आता है जल जाना भी
मौत भी दो गर तोहफ़े में तुम है मुमकिन गले लगाना भी
मौत हयात के बीच खड़ा हूँ हल दे दो इस मुश्किल का अब
मक़तूल मोहब्बत करता था कोई जुर्म नहीं क़ातिल का अब
57. मैं कैस तुम्हारा हूँ
तुम मेरे मुकद्दर की पाकीज़ा सी सूरत हो
मैं तेरा सहारा हूँ तुम मेरी जरूरत हो
तुम हया का पैकर हो पलकों को झुकाने पर
बस एक करम कर दो तुम अपने दीवाने पर
तीर ए नजर से तुम मुझको न करो घायल
हिकमत में नहीं इसका इलाज दिखाने पर
दरिया की रवानी तुम मैं तेरा किनारा हूँ
नायाब ज़मीं हो तुम मैं चाँद आवारा हूँ
हम दोनों में है रिश्ता इतना सा फक़त जानां
तुम लाज हो लैला की मैं कैस तुम्हारा हूँ
मैं ढलता सूरज हूँ तुम सांझ सुहानी हो
मैं यार कलम का हूँ तुम मेरी कहानी हो
अलगाव नहीं होगा चाहें भी अगर हम तो
मैं कृष्ण कन्हैया हूँ तुम मीरा दीवानी हो
मैं इश्क का पैकर हूँ तुम प्यार की मूरत हो
मैं तेरा सहारा हूँ तुम मेरी जरूरत हो
58. है शौक बहुत मंहगा हमने जिसे पाला है
कुंदन सा बदन लेकर काँटे वो उगलते हैं
अरमान मेरे दिल का पैरों से कुचलते हैं
है शौक बड़ा उनको बिजली भी गिराने का
हम उनके मुहल्ले से बच बच के निकलते हैं
नाजुक से कलेजे पर हमने उन्हें झेला है
नजरों की कमानों से जो तीर निकलते हैं
वो इश्क़ की राहों में यूं गड्ढे बनाते हैं
हम रोज ही गिरते हैं फिर रोज सम्भलते हैं
वो रोज सितम अपना देते हैं उठाने को
ये बोझ उठाकर भी हम शान से चलते हैं
है शौक बहुत मंहगा हमने जिसे पाला है
हम शौक ए मोहब्बत में दिन रात मचलते हैं
59. यहाँ मुहब्बत में रहजनी है
मरीज ए दिल की दवा है लेकिन असीर ए दिल की दवा नहीं है
न इसकी इतनी करो इबादत ये इश्क़ हरगिज़ खुदा नहीं है
न तुम अकेले हो मयक़दे में न यार तेरा अकेला साक़ी
ये शोख चंचल चपल निगाहें बताओ जग में कहाँ नहीं हैं
न ढूंढो आशिक जनम जनम का तुम्हें न कोई यहाँ मिलेगा
बगैर शर्तों की अब मुहब्बत खतम है बिल्कुल यहाँ नहीं है
है ख्वाहिशें बेपनाह सबकी दिलों में दौलत की चाह सबकी
यहाँ तो उलफत हवस भरी है किसी को शौक ए वफा नहीं है
कहाँ से ढूंढोगे यार दिल का कहाँ से तुमको सुकुं मिलेगा
वो पाक दामन कहाँ है चाहत वो राज़ ए दिल हमनवां नही है
यहाँ मुहब्बत में रहजनी है वो लूट लेंगे कदम कदम पर
नहीं है कोई यहाँ मुहाफिज यहाँ कोई पासबां नहीं है
60. हमारी उल्फ़त की पाक चादर
दिलों की चाहत तुम्हारी हम पर हमारी तुम पर बनी रहेगी
हमारी उल्फ़त की पाक चादर तुम्हारे सर पर तनी रहेगी
सदा हमारा यही करम है तुम्हारे ज़ज्बों का पास रखना
नहीं गवारा हमें है हरगिज़ तुम्हारे दिल को उदास रखना
तुम्हीं से रौशन हमारी दुनिया तुम्ही से दिल का क़रार भी है
तुम्ही से आँगन में शादमानी तुम्ही से घर में निखार भी है
तुम्ही हमारा जहाँ मुकम्मल बिना तुम्हारे मैं हूँ अधूरा
तुम्हारी ख़ातिर सुनो चकोरी सदा रहूँगा मैं चाँद पूरा
तुम्ही हमारी वफा की देवी सुनो हमारा गुमान तुम हो
हमारे बच्चों की नेक अम्मा हमारा सारा जहान तुम हो
तुम्हारी चाहत की चाँदनी को मैं अपने दिल में उतार लूँगा
तुम्हारी संगत में मैं भी अपना फटा मुकद्दर सँवार लूँगा
सुखों का सागर दुखों का दरिया मैं दोनों में ही हूँ साथ तेरे
मैं वो शज़र हूँ कि जिसकी छाया सदा ही तुम पर घनी रहेगी
दिलों की चाहत तुम्हारी हम पर हमारी तुम पर बनी रहेगी
हमारी उल्फ़त की पाक चादर तुम्हारे सर पर तनी रहेगी
61. तुम मुझसे मिलने आ जाना
जब सावन झूला झूले तो
जब पीली सरसों फूले तो
जब कलियाँ भी शरमाएं तो
जब भँवरा गीत सुनाए तो
दो प्यार के बोल सुना जाना
तुम मुझसे मिलने आ जाना

जब सूरज सांझ को ढल जाए
जब जुगुनू घर से निकल जाए
जब रात की रानी महकती हो
जब मस्त चकोरी चहकती हो
तब रुख पर चाँद दिखा जाना
तुम मुझसे मिलने आ जाना

जब मौसम भीगा जाए तो
जब पागल मन मदमाए तो
जब बारिश झूम के आए तो
जब बिजली तुम्हें डराए तो
आगोश में मेरे समा जाना
तुम मुझसे मिलने आ जाना
62. तेरे मुकाबिल खड़ा हूँ मैं
बचपन में हिचकोले खाती वो कागज की नाव दिखा
लोरी गाकर मुझे सुलाती उस ममता की छाँव दिखा
उँगली थाम के चलते थे जो खेतों की पगडंडी पर
वो बाबा के संग चलने वाले नन्हें नन्हें पाँव दिखा
मुझे दिखा वो बाग बगीचे चिड़ियों के संगीत सहित
बँसवारी के झुरमुट वाला मेरा प्यारा गाँव दिखा
जैसा मेरा बचपन थामुझे उसके ही अनुरूप दिखा
तेरे मुकाबिल खड़ा हूँ मैं तु मुझको मेरा रूप दिखा
आँखों को ठंडक पहुँचाता हुस्न वो मालामाल दिखा
शर्म ओ हया से रंग बदलता मुझे गुलाबी गाल दिखा
चाल में उसकी दिखला देना नागिन सा बलखाना भी
चाँद भी जिससे फीका हो मुझे ऐसा रूप कमाल दिखा
मेरे इश्क़ का हासिल मुझे दिखा दे जो मेरा हमराही है
डोली संग जो घर में उतरी मुझको चुनर लाल दिखा
बीत गई जो मेरी जवानी उसका सच्चा बिंब दिखा
तेरे मुकाबिल खड़ा हूँ मैं मुझे मेरा तू प्रतिबिम्ब दिखा
मेरा गुजरा कल जैसा था वो सच्चाई के साथ दिखा
झूठ फ़रेब को परे हटाकर सीधी सच्ची बात दिखा
सुन मुझे दिखा दे मेरा माजी जैसा मुझपर बीता है
उजले उजले दिन दिखला दे अंधी काली रात दिखा
अब थक जाता हूँ परवाजों में ताकत सारी ख़त्म हुई
तु कोटर में मजबूर पड़े इस पंछी के हालात दिखा
जो कुछ मुझमें दिखता है बस वैसा मेरा नक्श दिखा
तेरे मुकाबिल खड़ा हूँ मैं तु मुझको मेरा अक्स दिखा
बँसवारी के झुरमुट वाला मेरा प्यारा गाँव दिखा
जैसा मेरा बचपन थामुझे उसके ही अनुरूप दिखा
तेरे मुकाबिल खड़ा हूँ मैं तु मुझको मेरा रूप दिखा
आँखों को ठंडक पहुँचाता हुस्न वो मालामाल दिखा
शर्म ओ हया से रंग बदलता मुझे गुलाबी गाल दिखा
चाल में उसकी दिखला देना नागिन सा बलखाना भी
चाँद भी जिससे फीका हो मुझे ऐसा रूप कमाल दिखा
मेरे इश्क़ का हासिल मुझे दिखा दे जो मेरा हमराही है
डोली संग जो घर में उतरी मुझको चुनर लाल दिखा
बीत गई जो मेरी जवानी उसका सच्चा बिंब दिखा
तेरे मुकाबिल खड़ा हूँ मैं मुझे मेरा तू प्रतिबिम्ब दिखा
मेरा गुजरा कल जैसा था वो सच्चाई के साथ दिखा
झूठ फ़रेब को परे हटाकर सीधी सच्ची बात दिखा
सुन मुझे दिखा दे मेरा माजी जैसा मुझपर बीता है
उजले उजले दिन दिखला दे अंधी काली रात दिखा
अब थक जाता हूँ परवाजों में ताकत सारी ख़त्म हुई
तु कोटर में मजबूर पड़े इस पंछी के हालात दिखा
जो कुछ मुझमें दिखता है बस वैसा मेरा नक्श दिखा
तेरे मुकाबिल खड़ा हूँ मैं तु मुझको मेरा अक्स दिखा


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